ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1171, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे निवासस्थान देने वाले इंद्र! इस निचोड़े हुए सोमरस को पिओ. हे सर्वथा भयरहित
इंद्र! तुम्हारे पेट भली प्रकार भर जावें. हम तुम्हें सोमरस देते हैं. (१)
नृभिर्धूतः सुतो अश्नैरव्यो वारैः परिपूतः. अश्वो न निक्तो नदीषु.. (२)
नेताओं द्वारा धोया गया, कपड़ों की सहायता से निचोड़ा गया एवं मेष के बालों से
पवित्र किया गया सोमरस नदी में स्नान किए हुए घोड़े के समान शोभित है. (२)
तं ते यवं यथा गोभिः स्वादुमकर्म श्रीणन्तः. इन्द्र त्वास्मिन्त्सधमादे.. (३)
हे इंद्र! जिस प्रकार जौ को गाय के दूध में मिलाकर स्वादिष्ट बनाया जाता है, उसी
प्रकार हमने गोदुग्ध मिलाकर सोमरस को स्वादिष्ट किया है. मैं वह सोमरस पीने के लिए तुम्हें
यज्ञ से बुलाता हूं. (३)
इन्द्र इत्सोमपा एक इन्द्रः सुतपा विश्वायुः. अन्तर्देवान् मर्त्यांश्च.. (४)
देवों एवं मानवों के बीच में एकमात्र इंद्र ही सोमरस पीने वाले हैं. वे सोम पीने के लिए
सब अन्नों से युक्त हैं. (४)
न यं शुक्नो न दुराशीर्न तृप्रा उरुव्यचसम्. अपस्पृण्वते सुहार्दम्.. (५)
जिस कोमल हृदय वाले इंद्र को दीप्तिवाला सोम, दूध आदि से मिला सोम तथा तृप्ति
देने वाला पुरोडाश अप्रसन्न नहीं करता, उसी इंद्र की हम स्तुति करते हैं. (५)
गोभिर्यदीमन्ये अस्मन्मृगं न व्रा मृगयन्ते. अभित्सरन्ति धेनुभिः.. (६)
बहेलिए जिस प्रकार हरिणों को खोजते हैं, उसी प्रकार हमारे अतिरिक्त लोग गोदुग्ध
आदि से मिले सोमरस की सहायता से इंद्र को खोजते हैं. वे लोग स्तुतियां बोलते हुए गलत
ढंग से इंद्र के सामने जाते हैं, इसलिए उन्हें प्राप्त नहीं करते. (६)
त्रय इन्द्रस्य सोमाः सुतासः सन्तु देवस्य. स्वे क्षये सुतपाव्नः.. (७)
निचोड़े हुए सोमरस को पीने वाले इंद्र देव के लिए यज्ञशाला में तीन प्रकार का सोमरस
बनाया जावे. (७)
त्रयः कोशासः श्चोतन्ति तिस्रश्चम्व१: सुपूर्णाः. समाने अधि भार्मन्.. (८)
एक ही यज्ञ में तीन प्रकार के कलश सोमरस को धारण करते हैं एवं तीनों चमस भी
सोने से पूर्ण हैं. (८)
शुचिरसि पुरुनिः ष्ठाः क्षीरैर्मध्यत आशीर्तः. दध्ना मन्दिष्ठः शूरस्य.. (९)
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