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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1039, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1039

होते. तुम रथ के स्वामी बनकर सब देवों के साथ आओ एवं प्रमुख होता बनकर यहां बिछे
हुए कुशों पर बैठो. (१)
त्वामीळते अजिरं दूत्याय हविष्मन्तः सदमिन्मानुषासः.
यस्य देवैरासदो बर्हिरग्नेऽहान्यस्मै सुदिना भवन्ति.. (२)
हे विशेष गति वाले अग्नि! हव्य वाले लोग तुमसे सदा दूतकर्म की प्रार्थना करते हैं. तुम
जिसके बिछे हुए कुशों पर देवों के साथ बैठते हो, उसके दिन शोभन बन जाते हैं. (२)
त्रिश्चिदक्तोः प्र चिकितुर्वसूनि त्वे अन्तर्दाशुषे मर्त्याय.
मनुष्वदग्न इह यक्षि देवान्भवा नो दूतो अभिशस्तिपावा.. (३)
हे अग्नि! ऋत्विज् यजमान की ओर से तुम्हारे बीच दिन में तीन बार हव्य डालते हैं. हे
अग्नि! तुम मनु के समान इस यज्ञ में देवों का यजन करो हमारे दूत बनो एवं हमें शत्रुओं से
बचाओ. (३)
अग्नीरीशे बृहतो अध्वरस्याग्निर्विश्वस्य हविषः कृतस्य.
क्रतुं ह्यस्य वसवो जुषन्ताथा देवा दधिरे हव्यवाहम्.. (४)
अग्नि विशाल यज्ञ के स्वामी एवं सभी संस्कृत हव्यों के पति हैं. वसु अग्नि के यज्ञकर्म
की सेवा करते हैं. देवों ने अग्नि को हव्यवाहक बनाया है. (४)
आग्ने वह हविरद्याय देवानिन्द्रज्येष्ठास इह मादयन्ताम्.
इमं यज्ञं दिवि देवेषु धेहि यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५)
हे अग्नि! तुम देवों को हवि-भक्षण करने के हेतु बुलाओ. इंद्र आदि देव इस यज्ञ में
प्रसन्न हों. इस यज्ञ को स्वर्ग में देवों को प्रदान करो एवं हमें अपने कल्याणसाधनों से सुरक्षित
बनाओ. (५)
सूक्त—१२ देवता—अग्नि
अगन्म महा नमसा यविष्ठं यो दीदाय समिद्धः स्वे दुरोणे.
चित्रभानुं रोदसी अन्तरुर्वी स्वाहुतं विश्वतः प्रत्यञ्चम्.. (१)
अतिशय युवा, अपने घर में प्रज्वलित होकर दीप्त होने वाले, विस्तृत द्यावा-पृथिवी के
मध्य में स्थित, विचित्र ज्वाला वाले, भली प्रकार बुलाए गए एवं सब जगह गतिशील अग्नि के
समीप हम नमस्कार के साथ गमन करते हैं. (१)
स मह्ना विश्वा दुरितानि साह्वानग्निः ष्टवे दम आ जातवेदाः.
स नो रक्षिषद् दुरितादवद्यादस्मान्गृणत उत नो मघोनः.. (२)
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