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सर्वकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग ५१
एकहि एक बराबरि जाहु करौ अपने अपने चित को हित ।
फोरि कै क्यौ दुहूँ हाथ सकेदियै जौ बिधना घर बैठे दयो बित ॥ ६ ॥
सवैया
गोपी—
गोद भरै बित घाम कै जाय घरौ गहि गोद सो माय के आगै ।
पेट परे को लखै फल ज्यौं निपजै हौ सपूत सु भागनि जागै ।
बाँटिहै बोलि वधाई कमाई की जाति मैं जाते महा पति पागै ।
वास दिये को यहै गुन है घनआनंद जो छिन दोप न लागै ॥ ७ ॥
सवैथा
मधुमंगल—
नंद लला रससागर सों ललिता रिस की सलिला न बढैयै ।
नागरि आगरि हौ सबु भाँति तुम्हें अब कौन सी बात पढैयै ।
चोखन तोष नहि उपजै घनआनद क्यौ गुन दोष कहैयै ।
नेकु ढरे सुधरै सब काज अकाज इतो अपलोक चढ़ैयै ॥ ८ ॥
सवैया
ललिता—
सुनि रे मधुमंगल । दान-कथा सु जथारुचि होत वृथा हठ है ।
कर ओड़ि दिखाय दया मृदु है चलियै बहु भाँति बिनै करि नै ।
घनआनंद ऐंठ अमैठ किये कहा पैयत है रिझवारन पै ।
गुन गाय रिझयावहु देहि अबै बृषभानलली की निछावर कै ॥ ६ ॥
सवैया
सखा—
स्याम सुजान सबै गुनखानि बजावत बैन महा सुर साँचनि ।
अंग त्रिभंग अनंग-भरे दृग भौह नचाय नचावत नाँचनि ।
कीरतिदा कुलमंडन जौ निरखै भरि नैन बढै सुख-माँचनि ।
दान हँसे चुकि है घनआनंद रीझ नही सकि है हित-आँचनि ॥ १० ॥
सवैया
सखी—
आयो सखी चलि कुंज मै बैठि लखै घनआनद की सुघराई ।