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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग ४५
घनानन्द प्यारे सुजान सुनो, इत एक ते दूसरो आँख नही ।
तुम कौन धौ पाटी पढे हौ लला, मन लेहु पै देहु छटाँक नही ।'
कहने का तात्पर्य यह है कि प्रेम-वाटिका मे बोधा के भावो को ग्रहण नही
किया गया । प्रेम-वाटिका मे प्रेम का दार्शनिक निरूपण है, बोधा मे इस दृष्टि
का अभाव है । अत. इस दृष्टि से भो बोधा का काव्य प्रेम-वाटिकाकार का
उपजीव्य-काव्य नही हो सकता । डॉ० याज्ञिक के शब्दो मे -
'प्रेम-वाटिका की रचना रसखान द्वारा सवत् १६७१ मे ही हुई' इस तथ्य
पर संदेह करना असगत है । जो पुस्तक पहली बार सवत् १६४८ के आस-पास
और दूसरी बार संवत् १६६३-६४ मे प्रकाशित हुई, उसकी रचना सवत् १६७१
मे कैसे मानी जा सकती है ? जिस पुस्तक की खडित प्रति भारतेन्दु के पास थी
और जिसके आधार पर सवत् १६३० मे 'प्रेम-सरोवर' की रचना हुई । उसकी
रचना संवत् १६२२ मे जन्म लेने वाले गोस्वामी जी कैसे कर सकते थे ? सार
की बात यह है कि प्रेमवाटिका की रचना रसखान द्वारा सवत् १६७१ मे हुई
थी । इस ग्रन्थ के ५३ दोहो मे से लगभग १० मे रसखान छाप की श्लिष्ट
अथवा स्पष्ट कवि नाम रूप मे है । प्रेमवाटिका की प्रामाणिकता पर संदेह करने
का कोई कारण हमे दिखाई नही पडता ।'
प्रेमवाटिका का प्रतिपाद्य प्रेम है । इसे रूपकत्व प्रदान करने के लिए राधा
और कृष्ण को मालिन-माली का जोडा माना गया है । इसमे रसखान जी ने
प्रेम के स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया है । इनका मत है कि सच्चा प्रेम
अकारण होता है, उसमे किसी आकर्षक साधन की आवश्यकता नही । इसीलिए
माता, पिता, पुत्र, स्त्री आदि के प्रति जो प्रेम किया जाता है वह विशुद्ध नही
है । विशुद्ध प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए बताया गया है कि यह
अनुपम, अमित और सागर के समान होता है । जो व्यक्ति एक बार इस प्रेम
को प्राप्त कर लेता है, वह फिर इसे नही छोड़ पाता । श्रुति, पुराण, आगम-
स्मृति आदि सभी प्रेम के मार है । प्रेम ही साधना का आधार है, क्योकि
हृदय, कम और उपासना ये सब अहकार के मूल है । जब तक हृदय मे प्रेम
का अंकुर अंकुरिन नही होता, तब तक ज्ञान आदि व्यर्थ है और ये साधना मे
किसी प्रकार भी सहायक नही हो सकते । प्रेम ही भगवान् का स्वरूप है ।
जिस प्रकार भगवान् के स्वरूप का वर्णन नही किया जा सकता, उसी प्रकार

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