रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंदिग्ध छंद
सवैया
हेरत कुँज भुजा धरे स्याम सो नैक तबै हँसती न लुगाई ।
लाज़ न कानि हुती जिय माँझ सु मेटत जौ मग माँह कन्हाई ।
हेरेँ परै न गुपाल सखी इन जोबन आनि कुचाल चलाई ।
होय कहा अब के पछिताएँ जौ हाथ ते छुटि गई लहिकाई ॥१॥
शब्दार्थ-- हेरत=देखते हुए। कानि=मर्यादा। लरिकाई=लडकपन,.
बचपन ।
अर्थ--कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त
करती हुई कहती है कि हे सखि ! बचपन मे जब मै कृष्ण के ऊपर
कुंज मे अपनी भुजाओ को रख लेती थी, अर्थात् उसे बाहु-पाश मे बाँध लेती
थी तो उस घटना को देखते हुए भी अन्य स्त्रियाँ तनिक भी नही हँसती थी,
मेरा परिहास नही करती थी । यदि कृष्ण मार्ग मे मिल जाता था तो मै
निस्संकोच भाव से उससे मिलती थी । तब मेरे मन मे न तो लज्जा होती
और न कुल की मर्यादा का कोई भाव होता था । हे सखि अब मोहन के आने
पर मै चाहते हुए भी कृष्ण को नही देख पाती । यह मोहन तो मेरे लिए
इतना कटु अपिशाप बन गया है । लेकिन अब बचपन बीत गया तो अब
पछताने से क्या होता है ।
विशेष--गोपी के सरल भाव का स्वाभाविक वर्णन है ।
कवित्त
चीर की चटक औ लटक नव कुंडल की,
भौंह की मटक नेह आँखिन दिखाउ रे ।
मोहन सुजान गुरू-रूप के निधान फेरि,
बाँसुरी बजाई तनु-तपन सिराउ रे ॥
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