रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग ३४५
उमँगि-उमँगि आई गोकुल की, सकल मही धनधारी ।
जब ललना ललकारि निकासे, रूप सुधा की प्यारी ।
लिपटि गई घनस्याम लाल सो, चमक चमक चपला सी ॥
काजर देउ जु परि भरुवा के, सबै देहु मिलि गारी ।
कहि रसखान एक गारी पै, सौ आदर वलिहारी ॥ ४ ॥
शब्दार्थ—कालि=कल । दुरि=छिपकर । ललना=गोपी । चपला=
बिजली । भरुवा =भड़वा, विभिन्न वेशधारी ।
अर्थ—गोपियाँ कृष्ण के घर जाती है और कृष्ण को होली खेलने के लिए
ललकारती हुई कहती है कि हे मोहन ! आज होली है, कल तुम हमारे घर जाकर
गालीदे आये थे और आज अपनी माँ के पास छिपकर बैठ गये हो । हे कुन्ज-
बिहारी ! बाहर निकलो । देखो, गोकुल की समस्त वैभव वाली पृथ्वी उमग गई
है, अर्थात् चारो ओर मादक वातावरण छाया हुआ है । जब कृष्ण के सौन्दर्य-
अमृत की प्यासी गोपियो ने कृष्ण को बाहर निकाल लिया तो वे उससे
बिजली की तरह लिपट गई । तब वे कहने लगी कि सब मिलकर इस भड़वा
को (कृष्ण को) काला कर दो और इसे गाली दो ! रसखान कहते है कि उनकी
एक गाली पर सौ आदरो को निछावर किया जा सकता है ।
विशेष-उपमा अलकार ।
मैं कैसे निकसो मोहन खेलै फाग ।
मेरे सँग की सब गयी, मोहि प्रगट्यौ अनुराग ॥
एक रैनि सपनो भयौ, नन्द-नदन मिल्यौ आइ ।
मैं सकुचन घूँघट पर्यौ, (उन) भुज मेरी लपटाइ ॥
अपनौ रस मो को दयौ, मेरो लीनो घूँटि ।
बैरिन पलकैं खुल गयी, (मेरी) गई आस सब टूटि ।
फिरि मै बहुतैरी करी, नेकु न लागी आँखि ।
पलक मूँदि परिचौ लियो, (मैं) जाम एक लौं राखि ।
मेरे ता दिन ह्वै गयौ, होरी डाडो रोपि ।
सास ननद देखन गई, मौहि घर वासौ सोपि ॥
सास उसासन भारुई ननद खरी अनखाय ।
देवर डग धरिवो गनै,(मेरो) बोलत नाहु रिसाय ॥
तिखने चढि ठाडी रहूँ, लैन करू कनहेर ।