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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 357, कुल 368 में से

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पृष्ठ 357

३४२ रसखान-ग्रन्थावली
शब्दार्थ—नियाव = न्याय। राव = राजा। अंक भरि = बाहुपाश मे बाँध
कर। मोतिन की = माला के मनकों की। जगात = कर।
अर्थ—राधा की बाते सुनकर कृष्ण कहते है कि मेरा न्याय कौन कर
सकता है, क्योकि मै तीनो लोको का राजा हूँ अर्थात् मैं तो स्वय ही सबसे
बड़ा हूँ। तुम इसी कारण उल्लसित होकर यही दाव देखकर फेर लेती हो।
तुम वृन्दावन के कुंजो मे उत्पन्न कदम्ब के रथो की छाया मे चलो और जैसा
मैं चाहता हूँ, वहाँ तुम्हे बाहुपाश मे लूँगा। मैने हीरा, मणि, मानिक,
बाँध, पनके और मोती जैसे तुम्हारे शरीर पर कर लगाना है। गोरस तो
मैने अनेक बार अत्यधिक मात्रा मे खाया-पिया है, अब तुम यह समझ लो
कि मै तुम्हारे सुन्दर शरीर से कर वसूल करने आया हूँ।
सवैया
नौ लख गाय सुनी हम नन्द के तापर दूध दही न अघाने।
माँगत भीख फिरौ वन ही वन झूठी ही बातन के पन पाने॥
और की नारिन के मुख जोवत लाज गहौ कछु होहु सयाने।
जाहु भले जु चले घर जाहु चले बस जाउ वृन्दावन जाने॥१९१॥
शब्दार्थ—नौ लख = नौ लाख। अघाने = तृप्त हुए। जोवत = देखना।
होहु सयाने = होश मे आकर। जाने = जानती है।
अर्थ—कृष्ण की बाते सुनकर राधा कहती है कि हे कृष्ण! मैने सुना
हैं कि नद के नौ लाख गाये है, फिर भी तुम उनको दूध दही खाकर तृप्त
नही हुए। तुम वन-बन मे झूठी बाते बनाकर भीख माँगते फिरते हो। तुम
दूसरों की स्त्रियो के मुह देखते फिरते हो। तुम्हारा यह कार्य नही है, अतः
होश मे आकर कुछ शरम करो। अच्छा यही है कि तुम वृन्दावन अपने घर
चले जाओ, क्योकि हम तुम्हे भली प्रकार जानते है।