रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१८ रसखान-ग्रन्थावली
सवैया
वैद की औपध खाइ कछू न करै बहु सजम री सुनि मोसें ।
तो जल-पान कियौ रसखानि सजीवन जानि लियौ रस तोसें ।
ए री सुधामई भागीरथी नित पथ्य अपथ्य वनै तोहि पोसैं ।
आक धतूरो चबात फिरै विख खात फिरै सिव तेरे भरोसें ॥२५५॥
विशेष-औपध = औषधि । सजम = संयम । भागीरथी = गंगा । पथ्य =
'परहेज । अपथ्य = बद परहेज । पोसैं = प्रसन्न करने पर ।
अर्थ-कवि रसखान गंगा की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि
हे गंगे ! जिस व्यक्ति पर तुम्हारी कृपा हो जाती है, उसे न तो वैद्य की
औषधि खाने की आवश्यकता है और न किसी प्रकार का संयम करने की ही
जरूरत है । रसखान कहते हैं कि तेरे जल को पीने से सजीवन शक्ति और
अपार आनन्द प्राप्त होता है । हे अमृत जल से युक्त गंगे ! तेरे प्रसन्न करने
पर बदपरहेज भी परहेज के समान लाभदायक बन जाता है । इसीलिए तेरे
भरोसे पर शिव आक और धतूरे को चबाते हैं तथा विष को खाते हैं ।
तुलना-'बाँधे जटाजूट बैठि परवत कूट माँहि,
महाकाल कूटे कहौ कैसे के ठहरतौ ।
पीवै नित भगै रहै प्रेतन के सगै ऐसे,
पूछतौ को नगें जो न गंगे सीस धारतौ ।'
-पद्माकर
शिव-महिमा
सवैया
यह देखि धतूरे के पात चवात औ गात सो धूलि लगावत हैं ।
चहुँ ओर जटा अटकैं लटकै फनि सो कफनी फहरावत हैं ।
रसखानि जे ई चितवैं चित दै तिनके दुखदुन्द भजावत हैं ।
गज खाल कमालकी माल विसाल सो गाल बजावत आवत हे ॥२५६॥
शब्दार्थ-पात = पत्ते । फनि = सर्प । कफनी = एक प्रकार का वस्त्र
जिसे साधु पहनते हैं । भजावत है = नष्ट करते हैं :
अर्थ-कवि रसखान शिव की स्तुति करते हुए कहते हैं कि यह देखो :
शिव धतूरे के पत्ते चवाते हैं तथा शरीर मे धूलि लगाते हैं । उनकी जटाएँ