रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग ३०५.
ताहि दिना सो गडी अँखियाँ रसखानि मेरे अंग अंग मैं पूरी ।
पै न दिखाई परै अब बावरी दै कै वियोग विथा की मजूरी ॥२३६॥
शब्दार्थ—रतियाँ की = रात की । अंक = गोद ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अपनी-विरह व्यथा का वर्णन करती
हुई कहती है कि हे सखि ! मैं रात की बाते तुमसे क्या कहूँ ? वे बाते तो
कहने मे ही नही आती । कृष्ण ने मुझे अपनी गोद मे भर लिया, उसने अपनी
मनोकामना पूरी की, और रस का पान किया । उसी दिनसे उस आनन्द-सागर
की आँखे पूर्णतया मेरे अंग-अंग मे गडी हुई है, अर्थात् मैं उनकी शोभा को
तनिक देर के लिए भी नही भूल पाती । किन्तु हे सखि ! वियोग-व्यथा को
मजदूरी रूप मे देकर वह कृष्ण अब दिखाई नही पड़ता ।
विशेष—१. परम्परागत वर्णन है ।
२. 'बावरी' शब्द आत्मीयता का सूचक है ।
कवित्त
काह कहूँ सजनी सँग की रजनी नित बीतै मुकुन्द कोटे री ।
आवन रोज कहै मनभावन आवन की न कबौ करी फेरी ।
सौतिन-भाग बढ़्यौ ब्रज मै जिन लूटत हैं निसि रंग घनेरी ।
मो रसखानि लिखी बिधना मन मारिकै आयु बनी हौ अहेरी ॥२३७॥
शब्दार्थ—मुकुन्द = कृष्ण । रंग = आनन्द । विधिना = ब्रह्मा । अहेरी =
शिकारी ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से सपत्नी-भाव को प्रकट करती हुई कहती
है कि हे सजनी ! मै तुमसे अपनी व्यथा किस प्रकार प्रकट करूँ ? सारी रात
कृष्ण की बाट देखते-देखते ही बीत जाती है । मनभावन कृष्ण रोजाना मेरे
पास आने को कहते है, लेकिन उनकी मेरे यहाँ आने की कभी बारी ही नही
आती । आजकल तो ब्रज मे वह सौत ही बहुत भाग्यशाली है जो कृष्ण के
साथ रात को अत्यधिक आनन्द का भोग करती है । रसखान कहते है कि मेरे
भाग्य मे तो ब्रह्मा ने यही लिखा है कि मै अपने-आपको मारने के लिए स्वयं
ही अपनी शिकारी बनी हुई हूँ ।
सवैया
आये कहा करि कै कहिए वृपमान लली सो लला दृग जोरत ।
ता दिन तें अँसुवान की धार रुकी नही जद्यपि लोग निहोरत ।