रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग ३०३
सवैया
रसखान सुनाह वियोग के ताप मलीन महा दुति देह तिया की ।
पकज सौ मुख गौ मुरझाय लगी लपटैं बरै स्वाँस हिया की ॥
ऐसे मे आवत कान्ह सुने हुलसै सुतनी तरकी अँगिया की ।
यो जन जोति उठी तन की उसकाय दई मनो बाती दिया की ॥२३३॥
शब्दार्थ-सुनाह = प्रियतम । ताप = दुख । पकज = कमल । बरै = जलने
लगी । हुलसै = प्रसन्न हुई । सुतनी = दृढ़ डोर ।
अर्थ-कोई गोपी अपनी सखि से किसी अन्य विरहिणी गोपी के विषय
मे कह रही है । वह गोपी अपने प्रियतम के वियोग-दुख से इतनी दुखी थी कि
उसके शरीर की शोभा भी मद पड गई थी । उसका कमल-जैसा मुख भी
मुरझा गया था । उसके हृदय की साँसे लपट बनकर जलने लगी थी । इसी
बीच उसने अपने प्रियतम के आगमन की खबर सुनी । वह इतनी प्रसन्न हुई
कि उसकी कचुकी की दृढ़ डोर भी कसमसाने लगी । उसका शरीर इस प्रकार
शोभायुक्त हो उठा, मानो दीपक की बत्ती को उकसा दिया गया हो ।
विशेष-१. उपमा, उत्प्रेक्षा, समाधि अलकार ।
२ सवैया २०० मे भी यही उत्प्रेक्षा है ।
३ यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित
'रसखान-ग्रन्थावली' मे नही है ।
सवैया
विरहा की जु आँच लगी तन मे तब जाय परी जमुना जल मे ।
विरहानल तै जल सूखि गयौ मछली बही छाँडि गई तल मे ॥
जब रेत फटी रु पताल गई तब सेस जर यौं धरती-तल मे ।
रसखान तबै इहि आँच मिटै जब आय कै स्याम लगै गल मे ॥२३४॥
शब्दार्थ - विरहानल = वियोग की आग । धरती-तल-पाताल लोक ।
आँच मिटै = दुख दूर होगा, ज्वाला शान्त होगी ।
अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से अन्य विरहिणी गोपी का वियोग-दुख
वर्णन करती हुई कहती है जब उसके शरीर मे वियोग-दुख की आग बढ गई
तो वह उसे शान्त करने के लिए यमुना जल मे कूद गई । तब विरह की आग
के कारण यमुना का जल सूख गया और मछलियाँ जल के अभाव के कारण