सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 294

व्याख्या भाग २७७
२. चतुर्थ पंक्ति मे मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग ।
तुलना—हम भापत है हरिचन्द पिया अहो लाडिलि देर न मामै करो ।
चलो फूलौ भूलाओ झुकौ उझकौ इहिं पाख पतिव्रत ताख धरौ ॥
सवैया
मिलि खेलत फाग बढ्यौ अनुराग सुराग सनी सुख की रमकै ।
कर कुंकुम लै करि कजमुखी प्रिय के दृग लावन कौ धमकै ॥
रसखानि गुलाल की धूंधर मै ब्रजवालन की दुति यों दमकै ।
मनौ सावन माँझ ललाई के माँझ चहूँ दिसि ते चपला चमकै ॥१६३॥
शब्दार्थ—अनुराग = प्रेम । रमकै = अठखेलियाँ । कजमुखी = कमल
जैसे सुन्दर मुख वाली । लावन कौ = फेंकने के लिए । धूंघर = धुंधार ।
चपला = बिजली ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की होली का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखि ! कृष्ण गोपियो के साथ फाग खेल रहे थे । सुख की इन
सौभाग्यशाली अठखेलियो मे उनका प्रेम बढ़ गया था । कमल जैसे सुन्दर मुख
वाली गोपियाँ हाथ मे कुंकुम लेकर उसे उनके ऊपर फेकने के लिए अवसर
ताक रही थी । रसखान कहते है कि गुलाल की धुँआधार मे ब्रजबालाओ की
द्युति इस प्रकार चमक रही थी, मानो सावन मास की लालिमा मे चारो ओर
से बिजली चमक रही हो ।
विशेष—अंतिम पंक्ति मे उत्प्रेक्षा अलंकार ।
राधा का सौन्दर्य
कवित्त
आजु बरसाने बरसाने सब आनन्द सो,
लाडिली बरस गाँठि आई छवि छाई है ।
कौतुक अपार घर घर रग विसतार,
रहत निहारि सुध बुध विसराई हैं ।
आये ब्रजराज ब्रजरानी दधि दानी सग,
अति ही उमगे रूप रासि लूटि पाई है ।
गुनी जन गान घन दान सनमान, वाजे—
पौरनि निसान रसखान मन भाई है ॥१६४॥
शब्दार्थ—बरसाने = वर्षा ऋतु मे । बरसाने = ब्रज का एक गाँव, राधा