रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २७१
सवैया
कीजै कहा जु पै लोग चवाव सदा करिवौ करि है वजमारौ ।
सीत न रोकत राखत कागु सुगावत ताहिरी गावन हारौ ।
आव री सीरी करै अँखिया रसखान धनै धन भाग हमारी ।
आवत हे फिरि आज बन्यौ वह राति के रास को नाचन हारौ ॥१८३॥
शब्दार्थ—चवाव = निन्दा । वजमारौ = अत्यन्त घातक । सीत न रोकत
राखत कागु = कौआ शीतकाल (शरद् ऋतु) का आगमन नही रोक सकता ।
(शरद् आगमन के साथ ही श्राद्ध-समय समाप्त हो जाता है । अत कौवा नही
चाहता कि शरद् ऋतु आवे, पर उसे रोकना उस बेचारे के बस की बात नही
है । सीरी करै = शीतल करे, आनन्द प्राप्त करे ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से रासलीला मे सम्मिलित होने का
आग्रह करती हुई कहती है कि हे सखि ! यदि लोग हमारी अत्यन्त घातक
निन्दा सदा करते रहते है, तो करे, हमे इससे चिन्तित नही होना चाहिए,
क्योकि कौआ चाहे जितनी काँव-काँव करे, पर वह शरद् ऋतु के आगमन को
नही रोक सकता । अत. चलो, रासलीला मे सम्मिलित होकर हम अपनी आँखे
शीतल करे, आनन्द प्राप्त करे । हमारा भाग्य धन्य है जो हमे इस प्रकार की
रासलीला को देखने का अवसर प्राप्त हुआ है। कल रात को रासलीला मे
नृत्य करने वाला वह कृष्ण आज फिर बन-ठनकर रासलीला मे सम्मिलित हो
रहा है ।
विशेष—१ लोकोक्ति का सुन्दर प्रयोग है ।
२. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसादमिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान
ग्रंथावली' मे नही है ।
सवैया
सासु अच्छै वरज्यौ विटिया जु बिलोके अतीक लजावत है ।
मोहि कहै जु कहूँ वह बात कही यह कौन कहावत है ।
चाहत काहू के मूंड चढ़यौ रसखान झुकै झुकि आवत है ।
जब तै वह ग्वाल गली मे नच्यौ तब तै वह नाच नचावत है ॥१८४॥
शब्दार्थ—अच्छै वरज्यौ = अच्छी प्रकार रोकी । विटिया = पुत्रवधू ।
मूंड चढ़यौ = सिर पर चढ गया, धृष्ट हो गया ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से रासलीला का वर्णन करती हुई कहती