रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २६७.
सवैया
पूरब पुंन्यनि ते चितई जिन ये अँखियाँ मुसकानि भरी जू ।
कोऊ रही पुतरी सी खरी कोऊ घाट डरी कोऊ वाट परी जू ॥
जे अपने घरही रसखानि कहै अरु हौसनि जाति मरी जू ।
लाल जे बाल विहाल करी ते निहाल करी न निहाल करी जू ॥१७६॥
शब्दार्थ—चितई=देखी । पुतरी=काठ की पुतली । हौसनि=प्रसन्नता-
भरी लालसाएँ । बिहाल=व्याकुल । निहाल=प्रसन्न ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! कृष्ण की हँसी
भरी आँखों को जो बालाएँ देख पाईं, यह उनके पूर्व जन्मो के पुण्यो का ही
फल था । उन मुस्कान-भरी आँखों को देखकर कोई तो काठ की पुतली की
तरह निश्चेष्ट खडी रही, कोई घाट पर डर गई और कोई अपनी सुधि-बुधि
खोकर मार्ग मे ही पड गई । रसखान कहते है कि जो बालाएँ अपने घर थी,
वे प्रसन्नता-भरी लालसाओ मे मरी जाती थी । कृष्ण ने जिन बालाओ को
व्याकुल किया था, वस्तुत उन्हे व्याकुल न करके प्रसन्न किया था ।
सवैया
आजु री नन्दलला निकस्यौ तुलसीवन ते बन कै मुसकातो ।
देखे बनै न बनै कहतै अब सो सुख जो मुख मै न समातो ॥
हौ रसखानि बिलोकिबे कौ कुलकानि के काज कियौ हिय हातो ।
आइ गई अलबेली अचानक ए भटू लाज को काज कहा तो ॥१७७॥
शब्दार्थ—नन्दलला=कृष्ण । तुलसीबन=वृन्दावन । बनकै=बन-ठनकर ।
हातो=दूर । भटू=सखी ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! आज बन-
ठनकर मुस्कुराता हुआ कृष्ण वृन्दावन से निकला । उसकी शोभा न तो देखते
बनती थी और न कहते बनती थी और उसे देखकर जो सुख प्राप्त हुआ,
उसका वर्णन नही किया जा सकता । उस आनन्द-सागर को देखने के लिए
सभी ब्रज-बालाओ ने कुल की लाज और मर्यादा को अपने हृदय से दूर कर
दिया । हे सखि ! इतने मे ही, अचानक वह अलबेली आ गई तो फिर लाज
का क्या काम था ? अर्थात् सभी कृष्ण के प्रति पूर्णतया अनुरक्त होकर अपनी
लौकिक मर्यादाओ को भूल गई ।