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सर्वकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 368 में से

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व्याख्या भाग २५२
दोहा
स्याम सघन घन घेरि कै, रस बरस्र्यौ रसखानि ।
भई दिवानी पानि करि, प्रेम-मद्य मन मानि ॥१५१॥
शब्दार्थ—स्याम = काला, कृष्ण । सघन = गहन, प्रेमपूर्ण । रस = जल,
आनन्द । दिमानी = दिवानी । पानि करि = पीकर । प्रेम-मद्य = प्रेम रूपी
शराब । मन मानि = छिककर, पूर्ण तृप्त होकर ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! गहन बादल
रूपी प्रेमपूर्ण श्याम कृष्ण ने मेरे ऊपर जल रूपी आनन्द की वर्षा की और
मैंने छिककर प्रेम रूपी शराब पी । उस शराब को पीकर मै कृष्ण दिवानी
हो गई ।
भाव यह है कि मै कृष्ण के प्रेम मे मदोन्मत्त बन गई हूँ ।
विशेष—श्लेष और रूपक अलंकार ।
सवैया
कोउ रिझावन कौ रसखानि कहै मुकतानि सो माँग भरौगी ।
कोऊ कहै गहनो अग-अग दुकूल सुगन्ध पर्यौ पहिरौगी ॥
तूँ न कहै न कहै तो कहौ हौ कहू न कहौ तेरे पाँय परौगी ।
देखहि तूँ यह फूल की माल जसोमति-लाल निहाल करौगी ॥१५२॥
शब्दार्थ — मुकतानि सो = मोतियो से । दुकूल = वस्त्र । निहाल = प्रसन्न ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि । आनन्द-
सागर कृष्ण को रिझाने के लिए कोई गोपी तो यह कहती है कि मै अपनी
भौंहो मे मोतियो को पिरोऊँगी, कोई कहती है कि मै अपने अग-अग पर
आभूषण पहनूँगी और कोई कहती है कि मै अपने वस्त्रों को सुन्दर एव
मादक गन्ध से परिपूर्ण कर लूँगी । यदि तू किसी से मेरी बात न बताये
और इस बात का वचन दे तो मै तुझे बताये देती हूँ कि मै तो इस फूल-माला
से ही यशोदा-पुत्र कृष्ण को प्रसन्न कर लूँगी ।
कहने का भाव यह है कि कृष्ण को फूल-माला ही सर्वोत्तम प्रिय है, किन्तु
इस बात को अन्य गोपियाँ नही जानती ।
विशेष—तृतीय पंक्ति मे शब्द-योजना अनुपम है ।