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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 268, कुल 368 में से

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पृष्ठ 268

व्याख्या भाग २५१
शब्दार्थ - औचक = अचानक । अनुरागी = प्रेमिका । रिस = क्रोध ।
भरि नैन न जागी = आँखो मे छवि भरकर जागने का अवसर भी नही मिला ।
अक = हृदय ।
अर्थ- कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! अचानक ही
कृष्ण मुझे दिखाई पड गये और मै उन्हे देखने लगी । इसी पर ननद ने मेरी
यह बदनामी फैला दी कि मै कृष्ण मे अनुरक्त हूँ और उनकी प्रेमिका हूँ ।
इस बदनामी को सुनकर सासु ने मुझ से मुँह मोड लिया है और जिठानी
क्रोध मे भर कर फिर रही है । हे सखि ! तू अच्छी प्रकार से मेरी आँखों
मे झाँक कर देख, तब तुझे पता चलेगा कि मै कभी भी इन आँखो मे कृष्ण
के रूप की छवि भरकर नही जागी हूँ । हे सखि ! मुझे केवल यही पछतावा
है कि कृष्ण-प्रेम का मुझे कलंक तो लग गया है, पर मै कभी भी उसके हृदय
से नही लग पाई हूँ ।
विशेष - अन्तिम पंक्ति मे यमक अलकार ।
तुलना - 'लागे कलकहुँ अक लगे नहि तो सखि भूल हमारी महा है।'
— हरिश्चन्द्र
सवैया
सास की सास नही चलिवो चलियै निसिद्यौस चलावै जिही ढग ।
आली चबाव लुगाइन के डर जाति नही न नदी ननदी-सग ।
भावती औ अनभावती भीर मै छुवै न गयौ कबहुँ अंग सो अग ।
घैरु करै घरुहाईं सबै रसखानि सौ मो सौ कहा कै भयो रग ॥१४६॥
शब्दार्थ - सासनही = आदेश के अनुसार । निसिद्यौस = रात-दिन ।
चबाव = बदनामी की चर्चा । भावती = प्रिय । अनभावती = अप्रिय । घैरु =
बदनामी । घरुहाईं = बदनाम करने वाली स्त्रियाँ । रग = प्रेम ।
अर्थ - कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का उल्लेख
करते हुए कहती है कि यद्यपि मै सासु के आदेश के अनुसार ही चलती हूँ ।
वह रात-दिन जिस प्रकार चलाती है, उसी प्रकार चलती हूँ, अर्थात् हर प्रकार
से प्रत्येक समय उसकी आज्ञा का पालन करती हूँ । अन्य नारियो के द्वारा
बदनामी की चर्चा के डर से मै अपनी ननदी के साथ नदी के किनारे भी
नही जाती । प्रिय तथा अप्रिय भीड मे भी मेरा शरीर कभी भी उसके शरीर
से छुआ नही है । फिर भी बदनाम करने वाली सभी स्त्रियाँ मेरी बदनामी