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सर्वकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 266, कुल 368 में से

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पृष्ठ 266

व्याख्या भाग २४६
था । मैं अनेक प्रकार की भूल कर चुकी थी, जिन्हें मैं भूल गई, पर उस दिन
जो भूल कृष्ण-मिलन का कारण हुई थी, वह भुलाए नही भूली जाती ।
विशेष-यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-
ग्रंथावली' मे नहीं है ।
सवैया
समुझै न कछू अजहूँ हरि सो ब्रज नैन नचाइ नचाइ हँसै ।
नित सास की सीरी उसासनि सौं दिन ही दिन माइ की कांति नसै ।
चहुँ ओर बवा की सौं सोर सुनै मन मेरेऊ आवति री सकसै ।
पै कहा करौ वा रसखानि विलोकि हियो हुलसै हुलसै हुलसै ॥१४५॥
शब्दार्थ-सोर = बदनामी । सकसै = उलझ । हुलसै = प्रसन्न होना ।
अर्थ- कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अन्य गोपी के आकर्षण
को व्यक्त करती हुई कहती है कि हे सखी ! वह आज भी कुछ नही समझती,
वरन् कृष्ण को देखकर ब्रज में आँखे नचा-नचाकर हँसने लगती है । नित्य सासु
की ठंडी साँसो से उस गोपी की कांति दिन-दिन क्षीण होती जा रही है । मैं
बाबा की सौगन्ध खाकर कहती हूँ कि चारो ओर उसकी बदनामी को सुनकर
मेरे मन मे उलझन पैदा हो गई है । लेकिन क्या करूँ, उस आनन्द-सागर
कृष्ण को देखकर उसका हृदय बार-बार हुलसने लगता है, अर्थात् वह अपनी
बदनामी की चिन्ता न करके बराबर कृष्ण मे अनुरक्त है ।
विशेष-अन्तिम पंक्ति मे 'हुलसै' शब्द की आवृत्ति भावो मे तथा प्रभाव
मे अभिवृद्धि का कारण है ।
सवैया
मारग रोकि रह्यौ रसखानि के कान परी झनकार नई है ।
लोग चितै चित दै चितए नख तै मन माहि निहाल भई है ।
ठोढी उठाइ चितै मुसकाइ मिलाइ कै नैन लगाइ लई है ।
जो बिछिया बजनी सजनी हम मोल लई पुनि बेचि दई है ॥१४६॥
शब्दार्थ-नख ते = नख से शिख तक, पूर्ण रूप से । निहाल = प्रसन्न ।
बिछिया = पैर का एक आभूषण ।
अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! आनन्द-सागर
कृष्ण ने राधा का मार्ग रोका और उसके कानो मे एक नवीन झकार पडी ।