रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 118, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग १०१
कृष्ण के साथ फागलीला न करे—
'फागुन लाग्यौ सखी जब ते तब ते ब्रजमण्डत धूम मच्यौ है।
नारि नवेली बचै नहिं एक बिसेख मरै सबै प्रेम अँच्यौ है ।
साँझ सकारे वही रसखानि सुरग गुलाल लै खेल रच्यौ है ।
को सजनी निलजी न भई अरु कौन भटू जिहि मान बच्यौ है।'
कृष्ण की कुंज-लीलाएँ भी वैसी ही आकर्षक हैं जैसी अन्य लीलाएँ।
जब मुस्कराते हुए कृष्ण कुज से निकलते हैं तो उनकी शोभा को जो भी
गोपी देख लेती है वह इतनी भाव-विभोर हो जाती है कि उसे कृष्ण के
अतिरिक्त और कोई बात ही याद नहीं रह पाती। उसके सारे
सामाजिक बन्धन टूट जाते है और नारी सुलभ लज्जा की प्रतिष्ठा समाप्त
हो जाती है—
'रग भर्यो मुस्कात लला निकस्यौ कल कु जन ते सुखदाई ।
मैं तबही निकसी घर ते तकि नैन बिसाल की चोट चलाई ।
घूमि गिरी रसखानि तबै हरिनी जिमि बान ललजै गिरि जाई।
टूटि गयो घर को सब बन्धन टूटिगौ आरज-लाज वडाई।'
इन लीलाओ के अतिरिक्त दानलीला, चीरहरण-लीला आदि का वर्णन
भी रसखान ने किया है।
निर्गुण कृष्ण
जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि कृष्णभक्त-कवियो को सिद्धान्ततः
कृष्ण का निर्गुण स्वरूप ही मान्य है। इस स्वरूप का प्रतिपादन सभी कवियो
ने किया है। सूरदास की विशेषता तो यह रही है कि वे कृष्ण के साकार
अथवा अवतारी-रूप का वर्णन करते-करते बीच-बीच मे उनके अलौकिकत्व का
भी सकेत देते जाते हैं। यथा—
'जसोदा तेरौ मुख हरि जोव ।
कमलनैन हरि हिचिकिनि रोवै, बन्धन छोरि जसोव ।
जो तेरौ सुत खरौ अचगरौ, तऊ कोखि को जायौ ।
कहा भयौ जो घर कै ढोटा, चोरी माखन खायौ ।
कोरी मटुकी दह्यौ जमायौ, जाख न पूजन पायौ ।
तिहि घर देव पितर काहं को, जा घर कान्हर आयौ ।