रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदश प्रभाव २४३
कालि तें कालि कै होन दई हँसी, पाइ परौं न परौ मुँह काढ़ौ ।
राज करौ यह राज सदा रहै केसव चित्र ज्यों आगे ही ठाढ़ौ ।६।
भावार्थ—जो 'नहीं' सिखाती हैं वे भली नहीं हैं । 'नहीं' सिखानेवाली
स्त्रियों का मुख आग से जला दो । भौंहों के ( इस रोष भाव ) को भुला दो,
नेत्रों के अनुकूल चलकर प्रेम बढ़ायो । कल-कल करके तो तुमने खूब अपनी
हँसी होने दी । पैरों पड़ती हूँ अब पड़ी ( लेटी ) न रहो अपना मुँह ( चादर
में से ) बाहर निकालो । चलो रजो राजो, तुम्हारा यह राज सदा रजा रहे
और चित्र की भाँति ज्यों का त्यों आगे खड़ा रहे ।
सूचना—हस्तलिखित प्रति में और सरदार की टीका में यह छंद मिलता
है, पर लीथोवाली प्रति में नहीं है । सरदार ने लिखा है—'यह कबित्त प्राचीन
पुस्तकन में नाहीं मिलत तातें नारायण कवि नहीं लिख्यो ।
पुनः—( सवैया )
(४४८) रीझि रिझाइ झरोखनि झाँकि रही मुख देखि दिखाइ सुबाहीं ।
बोलन आएँ अबोली भई अब केसव ऐसी हमें न सुहाहीं ।
मैं बहुतै बहराई हैं तो सी तू बहरावति मोहिं वृथाहीं ।
एहीं समान सदा चलिहौ हरि सों हँसि 'हाँ' करै मोहीं सों नाहीं ।७।
शब्दार्थ—रीझि = मुग्ध होकर । रिझाइ = मुग्ध करके । सुबाहीं=स्व-
भावतः, प्रकृत्या । बोलन = बोलने के लिए । अबोल = मौन । बहराई =
भुलावा दिया । सयान = चतुराई ।
भावार्थ—स्वयम् मुग्ध होकर और नायक को मुग्ध करके झरोखों से
झाँक कर स्वभावतः उनका मुख देख रही है और अपना दिखा रही है । पर
जब यहाँ बोलने के लिए आते हैं तब चुप्पी साध लेती है । मुझे ऐसी स्त्रियाँ
अच्छी नहीं लगतीं । तेरी ऐसी बहुतों को मैंने भुलावा दिया है, पर तू जो मुझे
भुलावा देना चाहती है वह व्यर्थ है । क्या सदा तेरी यही चतुराई चलती रहेगी ?
कैसी विलक्षण है कि नायक से तो हँसकर 'हाँ' करती है और मुझसे 'नहीं' ।
कृष्ण को मनाइबो—( सवैया )
(४४६) भूषन-भेद बनाइकै केसव फूल बनाइ बनाइकै बागे ।
भाग बढ़ाइ सुहाग बढ़ाइक राग बढ़ाइ हियें अनुरागे ।
६—पावक-जावक । सों-लों । होन-दौन । न परो-तन प्यौ । यह
जहँ । राज-आज । आगे०-आग ही डाढ़ो । ७—री-पै । एहीं-याही, ऐसे ।
करै-करि । मोहीं-मोहिं, मोहू ।