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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 286 में से

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पृष्ठ 214

२१८ रसिकप्रिया
बदन उघारतहीं 'मदन-सुयोधनहों,
द्रौपदी ज्यों नाम मुख तेरो ही ररति है ।१६।
भावार्थ—कुँवर = श्रीकृष्ण। वृषभानु की कुँवरि = राधिका । देवता =
देवी । बिहरति है=बिहार करती है । कमला = लक्ष्मी । कमलाग्रजा = लक्ष्मी
की बड़ी बहन, दरिद्रा । काली = काली देवी ( इन्हें केतकी का फूल नहीं
चढ़ता, यह पौराणिक मत है) । निसिचर=राक्षस, रात्रि में चलनेवाला (चंद्रमा
का विशेषण ) । बदन = शरीर । उघारतहीं = खोलने का प्रयत्न करते ही ।
मदन = काम रूपी । सुयोधनहीं = दुर्योधन के द्वारा । ररति = रटती है ।
अलंकार—भिन्नधर्मा मालोपमा ।
सूचना—( १ ) दरिद्रा को 'कमलाग्रजा' कहते हैं । पर कई प्रतियों में
'कमलानुजा' पाठ ही मिलता है । वह केवल प्रमाद जान पड़ता है ।
( २ ) कमलों से वह इसलिए डरती है कि उसे शोभा नहीं भाती ।
पुनर्यथा—(कबित्त)
(४०६) भौरिनी ज्यों भँवत रहति बन बीथिकानि,
हंसिनी ज्यों मृदुल मृनालिका बहति है।
पीउ पीउ रटति रहति चित चातकी ज्यों,
चंद चितै चकई ज्यों चुप ह्वै रहति है।
हरिणी ज्यों हेरति न केसरि के काननहि,
केका सुनि ब्याली ज्यों बिलानहीं चहति है।
केसव कुँवर कान्ह बिरह तिहारे ऐसी
सूरति न राधिका की मूरति गहति है ।१७।
शब्दार्थ—भँवत रहति = घूमती ही रहती है । वीथिकानि = गलियों में ।
मृनालिका = कमलनाल । बहति है=धारण करती है (जैसे हंसिनी मृणाल
लेकर उसे खेलते खेलते तोड़ डालती है वैसे यह भी उसे लेकर तोड़ डालती
है) । हेरति न=नहीं देखती । केसरि के काननहि=सिंह के वन को (हरिणी
के पक्ष में) ; केसरवाले वन को ( नायिका के पक्ष में) । केका = मोर की
वाणी । ब्याली = सर्पिणी । बिलानहीं चहति है = बिलों को ही देखने लगती है
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१६—सखी की पत्री-श्रीराधिकाजू की प्रकाश पत्री, प्रिया को विरहनिवेदन ।
आजु-बन । कहूँ-कान्ह । दिन-ठौर । डरति-जरति, दुरति । रुचै-सुँघै । मुख
तिन-मुखचंद, चंदमुख । जरति-रति । १७—भौरिनी०-भौँरि ज्यों भंवति
है भवन । बहति-चहति । काननहि-कानन को । चहति-कहति ।