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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 69

भाषाटीकासहित । ( ५३ )
बन जाती है । यह निश्चन्द्र अभ्रक भस्म शुद्ध शरीरवाला मनुष्य
सेवन करे तो रसायन है ॥ १६६ ॥ १६७ ॥
अभ्रक भस्मके गुण ।
निश्चन्द्रमारितं व्योम रूपवीर्यं दृढं तनुम् ।
कुरुते नाशयेन्मृत्युं जरारोगकदंबकम् ॥ १६८ ॥
निश्चंद्र शुद्ध अभ्रक भस्म मनुष्य सेवन करे तो आयुकी वृद्धि
हो, रूप और वीर्य बढे शरीर दृढ होजाय, निश्चन्द्र अभ्रक भस्म जरा
और मृत्यु तथा रोगोंके समूहको नष्ट करती है ॥ १६८ ॥
इति अभ्रकमारण ।
हरिताल ( हडताल ) प्रकरण ।
हरितालके पर्याय ।
हरितालं तालमालं मालं शैलूषभूषणम् ।
पिञ्जकं रोमहरणं तालकं पीतमित्यपि ॥ १६९ ॥
हरिताल, ताल, आल, माल, शैलूषभूषण, पिञ्जक, रोमहरण, तालक
और पीत ( ताल, मनोज्ञ, पीतक, पिंग, कांचनक, हरिबीज,
पीत, चित्रांग, वंशपत्रक, गौरीललित ) यह हरितालके पर्यायवाचक
शब्द ( नाम ) हैं ॥ १६९ ॥
हरितालके भेद ।
तालकं पटलं पिण्डं द्विधा तत्राद्यमुत्तमम् ॥ १७०॥
हरिताल दो प्रकारकी होती है, एक पटल ( वर्की ), दूसरी पिण्ड,
इनमें पटल अर्थात् वर्की हरिताल उत्तम होती है ॥ १७० ॥
अशुद्ध हरितालके दोष ।
अशुद्धतालमायुर्घ्नं कफमारुतमेहकृत् ।
तापस्फोटाङ्गसङ्कोचान् कुरुते तेन शोधयेत् ॥ १७१॥