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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 584 में से

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पृष्ठ 62

( ३६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
अथ अभ्रकप्रकरण ।
अभ्रकं गिरिजाबीजममलं गगनाह्वयम् ।
तत्र कृष्णाभ्रके वज्रं पीतात्मनि तु ग्राहिकम् ॥
सितात्मके तारकं स्याद्भीरुकं रक्तके वरम् ॥१३९ ॥
अभ्रक, गिरिजाबीज, अमल, गगन, गगनाह्वय ( भोड्ल ) यह सब
अभ्रकके नाम हैं ( और भी आकाशके वाचक शब्द अभ्रकके पर्याय
जानने ) । वह अभ्रक-काला, पीला, सफेद और लाल इन भेदोंसे
चार प्रकारका होता है । इनमें काले वर्णके अभ्रकोंमें वज्राभ्रक श्रेष्ठ
होता है । पीले अभ्रकोंमें ग्राहिक, सफेदमें तारक और लाल वर्णके
अभ्रकोंमें भीरुक नामक अभ्रक श्रेष्ठ होता है ॥ १३९ ॥
वज्राभ्रकके लक्षण ।
सुप्रशस्तं कठोराङ्गं गुरु कज्जलसन्निभम् ॥ १४० ॥
यन्न शब्दायते वह्नौ नैवोच्छूनं भवेदपि ।
सदाकरसमुद्भूतं वज्रेति प्रथितं घनम् ॥ १४१ ॥
जो अभ्रक-स्वच्छ, कठोरांग, भारी, कज्जलके समान वर्णवाला
हो और अग्निमें डालकर धमानेसे शब्द न करै, फूत्कार न करे,
सुन्दर आकारवाला ( कोई ऐसा कहते हैं कि सदाकरका अर्थ अच्छे
स्थानसे पैदा होनेवाला ) हो वैसा ही रहे फूले नहीं विकृतं न हो
उसको वज्राभ्रक कहते हैं ॥ १४० ॥ १४१ ॥
पिनाकं दर्दुरं नागं वज्रञ्चेति चतुर्विधम् ।
ध्मातमभ्रं दलचयं पिनाकं विसृजत्यलम् ॥१४२॥
फूत्कारं भुजगः कुर्याद्दर्दुरं भेकशब्दवत् ।
चतुर्थञ्च वरं ज्ञेयं न वह्नौ विकृतिं व्रजेत् ॥ १४३ ॥
काला अभ्रक-पिनाक, दर्दुर, नाग और वज्र इन भेदोंसे चार
प्रकारका होता है । इनमें अग्निमें रखकर ध्मायमान करनेसे जिसके