रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५४४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
द्विगुञ्जं भक्षयेदस्य मृत्युञ्जयमनुस्मरन् ।
क्षयमेकादशविधं ग्रहणीं रक्तपित्तकम् ॥ ९५ ॥
विविधान्वातजान्रोगांश्चत्वारिंशच्च पैत्तिकान् ।
हन्ति सर्वामयानेव कामिनीनां शतं व्रजेत् ॥ ९६ ॥
एकविंशतिरात्राद्धं परिहार्यं त्यजेदिह ।
यथेष्टाहारचेष्टो हि कन्दर्पसदृशो नरः ॥ ९७ ॥
मेधावी बलवान्प्राज्ञो बह्वाशी भीमविक्रमः ।
पुत्रार्थिनी तथा नारी सैव पुत्रं प्रसूयते ॥
अस्य सूतस्य माहात्म्यं वेत्ति शंभुर्नचापरः ॥९८॥
तिमि मत्स्यके पित्तके द्वारा भावना दिया हुआ सीसेका चूर्ण १
पल, सोनेकी भस्म १ तोला, रससिन्दूर २ पल, अभ्रकभस्म ३ पल
और लोहाभस्म ३ पल इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर घीका-
रके रस, ब्राह्मी, सम्हालू, शमी ( छोंकर ), गोरखमुंडी, सतावर,
गिलोय, तालमखाना, मुसली, विधारेके बीज और चित्रककी जड़ इन
प्रत्येकके रसमें अलग अलग सात सात भावना देवे । पश्चात् त्रिफला,
त्रिकुटा, नागरमोथा, चित्रककी जड़, इलायची, जायफल और लौंग
इन प्रत्येकका चूर्ण रससिन्दूरकी बराबर मिलाकर दो दो रत्तीकी
गोली बना लेवे । प्रथम अडूसेके फूलोंसे महादेवकी पूजा करके इस
औषधिका सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे ग्यारह प्रकारके
क्षय, संग्रहणी, रक्तपित्त, अनेक प्रकारके वातरोग, चालीस प्रकारके
पित्तरोग और इसके अतिरिक्त अन्यान्य सब प्रकारके रोग नष्ट
होते हैं । सैकड़ों स्त्रियोंसे मैथुन करनेकी शक्ति उत्पन्न होती है, इस-
पर यथेच्छ आहार और विहार करे । इस औषधिके प्रभावसे मनुष्य
कामदेवके समान शरीरवाला, मेधायुक्त, बलवान्, प्राज्ञ, बह्वाशी और