रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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सूतिकाघ्न रस ।
रसगन्धकलौहाभ्र जातीकोषं सुवर्चलम् ।
समांशं मर्दयेत्खल्ले छागीदुग्धेन पेषयेत् ॥ १० ॥
गुञ्जाद्वयप्रमाणेन सूतिकातंकनाशनः ।
ज्वरातीसाररोगघ्नः सूतिकासुखदायकः ॥
सूतिकाघ्नो रसो नाम ब्रह्मणा परिकीर्त्तितः ॥ ११ ॥
पारा, गंधक, लोहा, अभ्रकभस्म, जायफल और कालानमक यह
सब औषधि समान भाग लेकर बकरीके दूधमें खरल करके दो दो
रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे ज्वर,
अतिसार और सूतिकारोग नष्ट होते हैं । इसको स्वयं ब्रह्मदेवने
कहा है ॥ १० ॥ ११ ॥
सूतिकान्तक रस ।
रसाभ्रगन्धकव्योषं सुवर्णमाक्षिकं विषम् ।
सर्वमेकीकृतं चूर्णं खादेद्रक्तिचतुष्टयम् ॥ १२ ॥
सूतिकाग्रहणीरोगं वह्निमान्द्यञ्च नाशयेत् ।
अतिसारञ्च शमयेदपि वैद्यविवर्जितम् ॥
कासश्वासातिसारघ्नो वाजीकरण उत्तमः ॥ १३ ॥
पारा, अभ्रकभस्म, गंधक, त्रिकुटा, सोनामाखीभस्म और विष
यह सब औषधि समान भाग लेकर इसमेंसे चार रत्ती परिमाण
औषधि सेवन करे । इसके सेवन करनेसे सूतिकारोग, संग्रहणी, मंदाग्नि,
वैद्यों करके त्यागा हुआ अतिसार, श्वास, खाँसी और अतिसार रोग
नष्ट होते हैं और यह उत्तम वाजीकरण है ॥ १२ ॥ १३ ॥
गर्भचिन्तामणि रस ।
जातीफलं टंकणञ्च व्योषं दैत्येन्द्ररक्तकम् ।
तच्चूर्णं समभागेन मर्दितं प्रहरद्वयम् ॥ १४ ॥