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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 540, कुल 584 में से

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पृष्ठ 540

( ५१४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
अथ सूतिकारोगचिकित्सा ।
सूतिकारि रस ।
रसगन्धककृष्णाभ्रं तदर्द्धं मृतताम्रकम् ।
चूर्णितं मर्दयेद्यत्नान्मण्डूकपर्णीरसेन च ॥ १ ॥
छायाशुष्का वटी कार्या द्विगुञ्जाफलमानतः ।
क्षीरत्रिकटुना युक्ता सूतिकातङ्कनाशिनी ॥
ज्वरं तृष्णां रुचिं श्वासं शोथं हन्ति न संशयः ॥२॥
पारा, गन्धक और कृष्णाभ्रकभस्म यह प्रत्येक एक एक भाग,
तांबाभस्म आधा भाग इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर मण्डूक-
पर्णीके रसमें मर्दन करके दो दो रत्तीकी गोली बनाकर छायामें सुखा
लेवे + दूध और त्रिकुटेके चूर्णके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे
सूतिकारोग, ज्वर, तृषा, अरुचि, श्वास और शोथरोग दूर होते हैं ॥ १॥२॥
सूतिकाविनोद रस ।
रसगन्धकतुत्थञ्च त्र्यहं जम्बीरमर्दितम् ।
त्रिभावितं त्रिकटुना देयं गुञ्जाचतुष्टयम् ॥
गर्भिण्याः शूलविष्टम्भज्वराजीर्णेषु योजयेत्॥ ३ ॥
पारा, गन्धक, तूतिया इन तीनों औषधियोंको समान भाग लेकर
जम्भीरी नींबूके रसमें तीन दिनतक खरल करके त्रिकुटेके क्वाथमें
तीन भावना देवे । इसकी चार चार रत्तीकी गोली गर्भवती स्त्रीको
सेवन करावे तो शूल, विष्टम्भ, ज्वर और अजीर्णरोग दूर होते हैं ।
इसको सूतिकाविनोद रस कहते हैं ॥ ३ ॥
गर्भचिन्तामणि रस ।
तुत्थस्थाने हेम देयं चिन्तामणिरसे तथा ॥ ४ ॥
इस सूतिकाविनोद रसमें तूतियाकी जगह जो सोना मिला लिया
जाय तो गर्भचिन्तामणि रस तैयार होता है ॥ ४ ॥