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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 535

भाषाटीकासहित । ( ५०९ )
शिरोर्तिं नाशयत्याशु वज्रमुक्तमिवासुरम् ।
शिरोवज्ररसो नाम चन्द्रनाथेन भाषितः ॥ १० ॥
पारा १ पल, गंधक १ पल, लोहाभस्म १ पल, तांबाभस्म १ पल,
गूगल ४ पल,त्रिफलेकी तीनों औषधियोंका मिला हुआ चूर्ण २ पल,
मुलैठी, पीपल, सोंठ, गोखुरु, वायविडंग, बेलगिरी, सोनापाठा,कुंभेर-
पाढल, अरणी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कटेरी, बडीकटेरी और
गोखुरु यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेवे । इन सब
औषधियोंको एकत्र पीसकर दशमूलके क्वाथमें सात भावना देवे ।
पश्चात् घृतमें मर्दन करके एक एक मासेकी गोली बना लेवे । इस
औषधिको बकरीके दूध,सहत अथवा जलके साथ सेवन करनेसे वातज,
पित्तज, कफज और सन्निपातज शिरोरोग दूर होते हैं । इस शिरोवज्र
रसको महादेवने कहा है ॥ ६-१० ॥
चन्द्रकान्त रस ।
मृतसूताभ्रकं तीक्ष्णं ताम्रं गन्धं समं समम् ।
स्नुहीक्षीरैर्दिनं मर्द्यं भक्षयेन्माषमात्रकम् ॥ ११ ॥
मधुना मर्दितं सेव्यं लौहपात्रे दिने दिने ।
सप्ताहात्सूर्यवर्त्तादीञ्छिरोरोगान्विनाशयेत् ॥ १२ ॥
रससिन्दूर, अभ्रकभस्म, तीक्ष्णलोहभस्म, तांबाभस्म और गन्धक
इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके
प्रतिदिन एक मासे औषधि लेकर लोहेके पात्रमें सहतके द्वारा पीसकर
भक्षण करे । इसके सेवन करनेसे एक सप्ताहमें सूर्यावर्त्तादि शिरोरोग
नष्ट होते हैं ॥ ११ ॥ १२ ॥
महालक्ष्मीविलास रस ।
लौहमभ्रं विषं मुस्तं फलत्रयकटुत्रयम् ।
धूर्त्तूरं वृद्धदारञ्च बीजमिन्द्राशनस्य च ॥ १३ ॥