रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५०८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
एषा तोयानुपानेन प्रातः खाद्या हिताशिना ।
चिरजं सर्वरोगञ्च सन्निपातं सुदारुणम् ॥ ३ ॥
आमवातं शिरोरोगं मन्यास्तम्भं गलग्रहम् ।
ग्रहणीं श्लीपदं हन्ति त्वन्त्रवृद्धिं भगन्दरम् ॥ ४ ॥
कामलां शोथपाण्डुत्वं पीनसार्शोगुदामयान् ।
वटिका चन्द्रिका नाम वासुदेवेन भाषिता ॥ ५ ॥
भांगके बीज, धतूरेके बीज, कटेलीके बीज, हिज्जल (समुद्रफल)
के बीज, विधारेके बीज, पारा और गंधक यह सब औषधि समान
भाग लेकर अदरखके रसमें खरल करके मटरकी बराबर गोली बना
लेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल जलके साथ इस औषधिका सेवन करे ।
इससे बहुत पुराने रोग, घोरतर सन्निपात, आमवात, शिरोरोग, मन्या-
स्तम्भ, गलेकी पीड़ा, संग्रहणी, श्लीपद, अन्त्रवृद्धि, भगन्दर, कामला,
शोथ, पांडु, पीनस, बवासीर और गुदरोग नष्ट होते हैं । इस रस-
चन्द्रिका वटिकाको श्रीकृष्णने कहा है ॥ १-५ ॥
शिरोवज्र रस ।
पलं सूतं पलं गन्धं पलं लौहं पलं रवेः ।
गुग्गुलोः पलचत्वारि तदर्द्धं त्रिफलारजः ॥ ६ ॥
यष्टीमधु कणा शुण्ठी गोक्षुरक्रिमिनाशनम् ।
तोलकं दशमूलञ्च प्रत्येकं परिकल्पयेत् ॥ ७ ॥
क्वाथेन दशमूल्याश्च यथास्वं परिभावयेत् ।
घृतयोगेन कर्त्तव्या माषैकप्रमिता वटी ॥ ८ ॥
छागीदुग्धेन वा सेव्या मधुना पयसाथवा ।
वातिकं पैत्तिकञ्चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् ॥ ९ ॥