सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 530, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 530

( ५०४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
अथ नासारोगाधिकार ।
पञ्चामृत रस ।
शुद्धसूतं समादाय गन्धभागद्वयं ततः ।
त्रिभागं टङ्कणञ्चापि विषं भागचतुष्टयम् ॥ १ ॥
पञ्चभागं तथा देयं मरिचस्य प्रयत्नतः ।
शृङ्गवेररसैः पिष्ट्वा गुटिका पञ्चरक्तिका ॥ २ ॥
अनुपानं हितं योज्यं सर्वरोगप्रशान्तये ।
जलदोषोद्भवे रोगे महत्युग्रे जलोदरे ॥ ३ ॥
सन्निपातेषु रोगेषु नासाव्याधौ सपीनसे ।
व्रणशोथे व्रणे चैव उपदंशे भगन्दरे ॥ ४ ॥
नाडीव्रणे ज्वरे चैव नखदन्तविघातके ।
पञ्चामृतरसो योज्यः सर्वरोगप्रशान्तये ॥ ५ ॥
इति रसेन्द्रसारसंग्रहे नासारोगाधिकारः ।
शुद्ध पारा १ भाग, गंधक २ भाग, सुहागा ३ भाग, विष ४ भाग
और कालीमिरच ५ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके अदर-
खके रसमें खरल करके पांच पांच रत्तीकी गोली बना लेवे । सर्व
रोगोंको दूर करनेके लिये यथोचित अनुपानोंके साथ इस औषधिका
सेवन करना चाहिये । इस औषधिको जलदोषजनितरोग, उग्र
उदररोग, सन्निपात, नासारोग, पीनस, व्रण, व्रणशोथ, उपदंश,
भगंदर, नाडीव्रण, ज्वर और नख तथा दंताभिघात रोगोंमें प्रयुक्त
करे । इसको पञ्चामृत रस कहते हैं ॥ १–५ ॥
इति नासारोगचिकित्सा समाप्त ।