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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 504

( ४७८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
पारिभद्र रस ।
मूर्च्छितं सूतकं धात्रीफलं निम्बस्य चाहरेत् ।
तुल्यांशं खदिरक्वाथैर्दिनं मर्घञ्च भक्षयेत् ॥
निष्कैकं दद्रुकुष्ठघ्नः पारिभद्राह्वयो रसः ॥ ६२ ॥
रससिन्दूर, आमले और नीमके फलकी मींगी इन तीनों औषधि-
योंको समान भाग लेकर खैरके क्वाथमें एक दिनतक खरल करके चार
मासे परिमाण औषधि सेवन करनेसे दद्रु और कुष्ठरोग नष्ट होते हैं।
इसको पारिभद्र रस कहते हैं ॥ ६२ ॥
सिध्महर लेप ।
गन्धकं मूलकक्षारमार्द्रकस्य रसैर्दिनम् ।
मर्दितं हन्ति लेपेन सिध्मन्तु दिनमेकतः ॥ ६३ ॥
गन्धक और मूलीके खारको समान भाग लेकर अदरखके रसमें
एक दिनतक खरल करके सिध्मके ऊपर प्रलेप करनेसे एक दिनमें
सिध्मकुष्ठ नष्ट होता है ॥ ६३ ॥
कृष्णधुस्तूरजं मूलं गन्धतुल्यं विचूर्णयेत् ।
मर्द्यं जम्बीरनीरेण लेपनं सिध्मनाशनम् ॥ ६४ ॥
काले धत्तूरेकी जड़का चूर्ण और गन्धकका चूर्ण दोनोंको बराबर
भाग लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके प्रलेप करनेसे सिध्मकुष्ठ
नष्ट होता है ॥ ६४ ॥
अपामार्गस्य पञ्चाङ्गं कदलीद्रवसंयुक्तम् ।
पुटदग्धञ्च गोमूत्रैर्लेपनं दद्रुनाशनम् ॥ ६५ ॥
चिराचिटेके पञ्चांगको समान भाग लेकर केलेकी जड़के रसमें
पासकर मूषामें रखे, फिर उसको बंद करके पुटपाकमें पकावे; पश्चात्
गोमूत्रमें पीसकर प्रलेप करनेसे दद्रु रोग नष्ट होता है ॥ ६५ ॥