रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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पुटपाककी विधिसे पकावे। जब शीतल होजाय तब इसका चूर्ण करले ।
इसमेंसे पांच रत्ती परिमाण औषधि लेकर कठूमरके रसमें मिलाकर
अष्टादश प्रकारके कुष्ठ रोगोंमें प्रयोग करे । इस औषधिके सेवन
करनेसे सब प्रकारके कुष्ठ अल्पकालमें ही नष्ट होते हैं। सूर्यकी उपा-
सना करनेवाला मनुष्य सूर्यकी वन्दना करके कुष्ठकुलनाशक इस
औषधिका सेवन करे । इसको पीपलके चूर्णके साथ कुष्ठरोगमें प्रयुक्त
करे । इसको कुष्ठहरितालेश्वर रस कहते हैं ॥ ५२-५७ ॥
राजराजेश्वर रस ।
त्रिफला खादिरं सारममृता वागुजीफलम् ।
आतपे मर्दयेत्सूतं गन्धकं मृतताम्रकम् ॥ ५८ ॥
सुहस्तमर्दितं तालं यावत्तत्र विलीयते ।
भृंगराजद्रवं दत्त्वा दिनमात्रं विमर्दयेत् ॥ ५९ ॥
प्रत्येकं सूततुल्यं स्याच्चूर्णीकृत्य विमर्दयेत् ।
मध्वाज्याभ्यां लौहपात्रे कर्षाभ्यां भक्षयेत्ततः ॥६०॥
दद्रूकिटिभकुष्ठानि मण्डलानि विनाशयेत् ।
द्विगुञ्जोऽपि निहन्त्याशु राजराजेश्वरो रसः ॥ ६१॥
शुद्ध पारा, गन्धक, तांबेकी भस्म और हरितालभस्म यह सब
औषधि समान भाग लेकर धूपमें रखकर भांगरेके रसमें एक दिनतक
खरल करे । पश्चात् त्रिफला, खैरसार, गिलोय और बावचीके बीज
इन प्रत्येक औषधियोंको पारेकी बराबर लेकर एकत्र मिला लेवे । एक
कर्ष परिमाण घृत और सहतके साथ इस औषधिमेंसे दो रत्ती लेकर
लोहेके पात्रमें मिलाकर सेवन करनेसे दद्रु, किटिभकुष्ठ और मण्डलकुष्ठ
नष्ट होते हैं । इसको राजराजेश्वर रस कहते हैं ॥ ५८-६१ ॥