रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४७० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
पकावे । फिर शीतल होनेपर इसका चूर्ण करके फिर इसमें एक भाग
गूगल, नीमके पत्तोंका चूर्ण १ भाग, नीमकी छालका चूर्ण १ भाग,
नीमके फूलोंका चूर्ण १ भाग, नीमके बीजोंका तेल, नीमकी जड़का
चूर्ण १ भाग, त्रिफलेका चूर्ण ३ भाग, गिलोयका चूर्ण १ भाग,
विषका चूर्ण १ भाग, पटोलपत्रका चूर्ण १ भाग, खैरसारका चूर्ण १
भाग और अमलतासका चूर्ण १ भाग मिलाकर एक उत्तम पात्रमें
भरकर रख देवे । इसमेंसे चार मासे औषधि सहतमें मिलाकर सेवन
करे तो उदुम्बरकुष्ठ नष्ट होता है । यह संकोचरस कुष्ठ रोगमें अतीव
हितकारी है ॥ २१-२४ ॥
अमृतांकुर लोह ।
हुताशमुखसंशुद्धं पलमेकं रसस्य वै ।
पलं लौहस्य ताम्रस्य पलं भल्लातकस्य च ॥ २५ ॥
अभ्रकस्य पलञ्चैकं गन्धकस्य चतुःपलम् ।
हरीतकीविभीतक्योश्चूर्णं कर्षद्वयं द्वयोः ॥ २६ ॥
अष्टमात्राधिकं तत्र धात्र्याः पाणितलानि षट् ।
घृतं चाष्टगुणं लौहाद्द्वात्रिंशत्त्रिफलाजलम् ॥ २७ ॥
एकीकृत्य पचेत्पात्रे लौहे च विधिपूर्वकम् ।
पाकमेवास्य जानीयाच्छास्त्रज्ञो लौहपाकवित् ॥ २८ ॥
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय गुरुदेवद्विजार्च्चकः ।
रक्तिकादिक्रमेणैव घृतभ्रामरमर्द्दितम् ॥
लौहे च लौहदण्डेन कुर्यादेतद्रसायनम् ॥ २९ ॥
भिलावेसे शुद्ध किया रससिन्दूर १ पल, लोहभस्म १ पल, तांवा-
भस्म १ पल, भिलावेका चूर्ण १ पल, अभ्रकभस्म १ पल, गन्धक ४
पल, हरड़का चूर्ण २ कर्ष, बहेड़ेका चूर्ण २ कर्ष, आमले ६ तोले
८ मासे, घी ८ पल, त्रिफलेका क्वाथ ३२ पल, इनको एकत्र करके