रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ४६९ )
तांबेकी भस्म ३ पल, पारा १ पल, गंधक २ पल, त्रिकुटा ३ पल
और त्रिफला ३ पल लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके सम्हा-
लूके पत्तोंके रस, अदरखके रस और चित्रककी जड़के रसमें खरल
करके सूर्यकी धूपमें एक दिन सुखाकर मूषामें रखे, पश्चात् तुषोंकी
अग्निमें मूषाको रखकर पकावे । जब अपने आप शीतल होजाय तब
बारीक पीसकर चूर्ण कर लेवे । फिर उस चूर्णको बावचीके तेलमें
खरल करके उसी तेलमें ३ दिन भावना देवे । इसमेंसे प्रतिदिन चार
मासे औषधि सेवन करनेसे अवश्य कुष्ठ रोग नष्ट होता है । इसके
सेवन करनेके पश्चात् करंजके तेलमें पिसी हुई चित्रककी जड़,
गन्धक और सेंधानमक अथवा बावचीके कल्कको भक्षण करे। इसको
चन्द्रकान्त रस कहते हैं ॥ १७-२० ॥
सङ्कोच रस ।
मृतताम्राभ्रकं तुल्यं तयोः सूतश्चतुर्गुणम् ।
शुद्धं तन्मर्दयेत्खल्ले गोलकं कारयेत्ततः ॥ २१ ॥
त्रिभिस्तुल्यं शुद्धगन्धं लोहपात्रे क्षणं पचेत् ।
तन्मध्ये गोलकं पाच्यं यावज्जीर्णं तु गन्धकम्॥२२॥
एतन्मृद्वग्निना तावत्समुद्धृत्य विचूर्णयेत् ।
गुग्गुलुंनिम्बपञ्चाङ्गं त्रिफला चामृता विषम् ॥ २३ ॥
पटोलं खादिरं सारं व्याधिघातं समं समम् ।
चूर्णितं मधुना लेह्यं निष्कमौदुम्बरापहम् ॥
रसः संकोचनामायं कुष्ठे परमदुर्लभः ॥ २४ ॥
तांबेकी भस्म १ भाग, अभ्रककी भस्म १ भाग, शुद्ध पारा ८
भाग इन तीनों औषधियोंको एकत्र पीसकर गोलासा बना लेवे । फिर
उसमें दश भाग गन्धक मिलाकर लोहेके पात्रमें डालकर पकावे ।
जबतक गन्धक जीर्ण न होजाय तबतक इसको मन्द मन्द अग्निसे