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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 472, कुल 584 में से

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पृष्ठ 472

( ४४६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
प्लीहशार्दूल रस ।
सूतकं गन्धकं व्योषं समभागं पृथक्पृथक् ।
एभिः समं ताम्रभस्म योजयेद्वैद्यबुद्धिमान् ॥ ४१ ॥
मनःशिला वराटञ्च तुत्थं रामठलौहकम् ।
जयन्ती रोहितञ्चैव क्षारटङ्कणसैन्धवम् ॥ ४२ ॥
विडं चित्रं कनकञ्च रसतुल्यं पृथक्पृथक् ।
भावयेत्रिदिनं यावत्त्रिवृच्चित्रकणार्द्रकैः ॥ ४३ ॥
गुञ्जामात्रां वटीं खादेत्सद्यः प्लीहविनाशनम् ।
मधुपिप्पलिसंयुक्तां द्विगुञ्जां वा प्रयोजयेत् ॥ ४४ ॥
प्लीहानमग्रमांसञ्च यकृद्गुल्मं सुदुस्तरम् ।
आमाशयेषु सर्वेषु चोदरे शोथविद्रधौ ॥ ४५ ॥
अग्निमान्द्ये ज्वरे चैव प्लीह्नि सर्वज्वरेषु च ।
रसोऽयं प्लीहशार्दूलो गहनानन्दभाषितः ॥ ४६ ॥
शुद्ध पारा, गन्धक, सोंठ, मिरच, पीपल यह प्रत्येक औषधि एक
एक भाग, तांबेकी भस्म ५ भाग, मैनशिल, कौड़ीकी भस्म, शुद्ध
तूतिया, हींग, लोहभस्म, जयंतीके पत्ते, रोहिड़ेकी छाल, जवाखार,
सुहागा, सेंधानमक, विडनमक, चित्रककी जड़ और जमालगोटे यह
प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र
पीसकर निसोधकी जड़के रस, चित्रक रस, पीपलका क्वाथ और
अदरखके रसके साथ अलग अलग तीन तीन भावना देकर एक रत्ती
अथवा दो रत्ती भरकी गोली बना लेवे । पीपलके चूर्ण और सहतके
साथ इस औषधिका सेवन करे । प्लीहा, अग्रमांस, यकृत् और
गुल्मरोग, आमाशयके रोग, उदररोग,शोथरोग,विद्रधि, मन्दाग्नि,ज्वर,
प्लीहा और सर्व प्रकारके ज्वरोंको हरनेवाली यह औषधि गहनानन्द-
नाथने कही है । इसको प्लीहशार्दूल रस कहते हैं ॥ ४१-४६ ॥