रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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रोगानीकविनाशाय धन्वन्तरिकृतं पुरा ।
मृत्युञ्जयमिदं लोहं सिद्धिदं शुभदं नृणाम् ॥ ३६ ॥
यथादोषानुसार इसके अनुपानकी कल्पना करे । सम्पूर्ण रोग-
नाशक इस औषधिको प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करे तो प्लीहा, ज्वर,
खाँसी, विषमज्वर, बहुत पुराना और वंशज श्लीपद रोग नष्ट होता है ।
समस्त रोगोंको दूर करनेके लिये पूर्वकालमें मनुष्योंको सिद्धि देने-
वाली और मंगल कामनाओंको देनेवाली यह औषधि धन्वन्तरि
भगवान्ने कही है ॥ ३४-३६ ॥
प्लीहार्णव रस ।
हिंगुलं गन्धकं टङ्कमभ्रकं विषमेव च ।
प्रत्येकं फलिकं भागं चूर्णयेदतिचिक्कणम् ॥ ३७ ॥
पिप्पली मरिचञ्चैव प्रत्येकञ्च पलार्द्धकम् ।
मर्दयित्वा वटीं कुर्याद्वल्लमात्रां प्रयत्नतः ॥ ३८ ॥
सेव्या शेफालिदलजैर्वटी माक्षिकसंयुता ।
प्लीहानं षट्प्रकारञ्च हन्ति शीघ्रं न संशयः ॥ ३९ ॥
ज्वरं मन्दानलञ्चैव कासं श्वासं वमिं भ्रमिम् ।
प्लीहार्णव इति ख्यातो गहनानन्दभाषितः ॥ ४० ॥
सिंग्रफ, गन्धक, सुहागा, अभ्रकभस्म और विष इन प्रत्येकका
बारीक चूर्ण एक २ पल, पीपल और काली मिरचोंका चूर्ण प्रत्येक दो
दो तोले, इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके दो दो रत्तीकी
गोली बना लेवे । हरसिंगारके पत्तोंके रस और सहतके साथ इस
औषधिके सेवन करनेसे छः प्रकारकी प्लीहा, ज्वर, मंदाग्नि, खाँसी,
श्वास, वमन और भ्रमरोग नष्ट होते हैं । इस प्लीहार्णव रसको श्रीमान्
गहनानन्दनाथने कहा है ॥ ३७-४० ॥