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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 584 में से

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पृष्ठ 426

( ४०० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
भक्षयेत्पर्णखण्डेन हिंगुसिन्धुसुवर्चलैः ।
दाडिमञ्च तथा बिल्वं कार्षिकं भृङ्गजैर्द्रवैः ॥ १३ ॥
पिष्ट्वा तु सुरया युक्तं देयं स्यादनुपानकम् ।
सर्वगुल्मं निहन्त्याशु शूलञ्च परिणामजम् ॥ १४ ॥
पारा, गन्धक, सोनामाखीभस्म, जवाखार, तांबाभस्म और अभ्रक-
भस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर चीतेकी जड़के क्वाथ और
आकके पत्तोंके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे;
इसको पानमें रखकर खावे । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें हींग,
सेंधानमक, कालानमक, अनार और बेलगिरी इन सबको एक एक
कर्ष परिमाण लेकर भांगरेके रसमें खरल करके मदिराके साथ सेवन
करे । इसके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके गुल्म और परिणामशूल नष्ट
होते हैं । इसको वडवानल रस कहते हैं ॥ १३-१४ ॥
महानाराच रस ।
सूतटङ्कणतुल्यांशं मरिचं सूततुल्यकम् ।
गन्धकं पिप्पली शुण्ठी द्वौ द्वौ भागौ विमिश्रयेत् १५
सर्वतुल्यं क्षिपेद्दन्तीबीजं निस्तुषमेव च ।
द्विगुञ्जं रेचनं सिद्धं नाराचाख्यो महारसः ॥ १६ ॥
पारा, सुहागा और कालीमिरच यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग;
गंधक, पीपल और सोंठ यह प्रत्येक औषधि दो दो भाग और दंतीके
बीज ( जमालगोटे ) नव ९ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र पीस-
कर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे
अच्छे प्रकारसे विरेचन होजाता है । इसको महानाराच रस
कहते हैं ॥ १५ ॥ १६ ॥
विद्याधर रस ।
पारदं गन्धकं तालं ताप्यं स्वर्णं मनःशिलाम् ।
कृष्णाक्वाथैः स्नुहीक्षीरैर्दिनैकं मर्दयेत्सुधीः ॥१७॥