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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 425, कुल 584 में से

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पृष्ठ 425

भाषाटीकासहित । ( ३९९ )
गुल्मलानल रस ।
सूतकं लौहकं ताम्रं तालकं गन्धकं समम् ।
तोलद्वयमितं भागं यवक्षारञ्च तत्समम् ॥ ७ ॥
मुस्तकं मरिचं शुण्ठी पिप्पली गजपिप्पली ।
हरीतकी वचा कुष्ठं तोलैकं चूर्णयेद् बुधः ॥ ८ ॥
सर्वमेकीकृतं पात्रे क्रियन्ते भावनास्ततः ।
पर्पटं मुस्तकं शुंठ्यपामार्गं पापचेलिकम् ॥ ९ ॥
तत्पुनश्चूर्णयेत्पश्चात्सर्वगुल्मनिवारणम् ।
गुञ्जाचतुष्टयं खादेद्धरीतक्यनुपानतः ॥ १० ॥
वातिकं पैत्तिकं गुल्मं तथा चैव त्रिदोषजम् ।
द्वन्द्वजं श्लैष्मिकं हन्ति वातगुल्मं विशेषतः ॥
गुल्मकालानलो नाम सर्वगुल्मकुलान्तकृत् ॥ ११ ॥
पारा, लोहभस्म, तांबाभस्म, हरितालभस्म और गन्धक यह
प्रत्येक औषधि दो दो तोले और जौखार १० तोले लेवे । तथा नागर-
मोथा, कालीमिरच, सोंठ, पीपल, गजपीपल, हरड़, वच और कूठ
यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला इन सब औषधियोंको एकत्र
पीसकर पित्तपापड़ा, नागरमोथा, सोंठ, चिरचिटा और पाठा इन
प्रत्येकके रसकी सात सात भावना देकर चूर्ण कर लेवे । हरड़के
चूर्णके साथ अथवा हरड़के काथके साथ चार रत्ती परिमाण औष-
धिके सेवन करनेसे वातज, पित्तज, त्रिदोषज, द्विदोषज और कफज
प्रभृति सर्वगुल्म रोग नष्ट होते हैं । इसको गुल्मकालानल रस
कहते हैं ॥ ७-११ ॥
वडवानल रस ।
पारदं गन्धकं ताप्यं यवक्षारार्कमभ्रकम् ।
अग्न्यम्बुनाहिपत्रेण समर्द्याथ द्विगुञ्जकम् ॥ १२ ॥