रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३८८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
बना लेवे, फिर उसमें वायविडंग, नागरमोथा, त्रिफला, गिलोय, दन्ती,
निसोथकी जड़, चित्रककी जड़ और त्रिकुटा इन प्रत्येक औषधियोंका
चूर्ण एक एक कर्ष परिमाण, गोमूत्रमें शुद्ध किया हुआ पुराना मंडूर
भस्म ४ पल, लोहाभस्म ४ पल और कृष्णाभ्रक १ पल इन सब
औषधियोंको एकत्र कर सहत और घृतमें मर्दन करके चिकने बासनमें
भरकर रख देवे । इस औषधिको एक मासे अथवा दो मासे परि-
माण लेकर सेवन करके ऊपरसे गायका दूध अथवा शीतल जलका
अनुपान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे बहुत कालकी नष्ट हुई
अग्नि फिर दीपन हो जाती है ॥२९-३३॥
रोगं निहन्यात्परिणामशूलं शूलं तथान्नद्रवसंज्ञकं
च । यक्ष्माम्लपित्तं ग्रहणीं प्रवृद्धां जीर्णज्वरं
लोहितपित्तकञ्च ॥ नश्यन्ति ते यान्न निहन्ति
रोगान् योगोत्तमः सम्यगुपास्यमानः ॥ ३४ ॥
परिणामशूल, अन्नद्रव शूल, राजयक्ष्मा, अम्लपित्त, संग्रहणी,
जीर्णज्वर और रक्तपित्त रोग दूर होते हैं । सैकड़ों उत्तम
औषधियोंके सेवन करनेसे भी जो रोग नष्ट नहीं होते वह रोग इस
औषधिके सेवन करनेसे अवश्य नष्ट हो जाते हैं । इसको विद्या-
धराभ्र रस कहते हैं ॥ ३४ ॥
बृहद्विद्याधराभ्र ।
शुद्धसूत तथा गन्धं फलत्रयकटुत्रयम् ।
विडङ्गमुस्तकञ्चैव त्रिवृतादन्तिचित्रकम् ॥ ३५ ॥
आखुपर्णी ग्रन्थिकञ्च प्रत्येकं कर्षसम्मितम् ।
पलं कृष्णाभ्रचूर्णस्य मृतायश्च चतुर्गुणम् ॥ ३६ ॥
घृतेन मधुना पिष्ट्वा वटिकां कोलसम्मिताम् ।
एकैकां वटिकां खादेत्प्रातरुत्थाय नित्यशः ॥ ३७ ॥