रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३८७ )
कान्तलोहभस्म १ कर्ष, अभ्रक १ पल, मिश्री १ पल, सहत
१ पल और घृत १ पल इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर लोहेके
डंडेसे खरल करे । फिर त्रिकुटेका चूर्ण ३ तोले, त्रिफलेका चूर्ण ३
तोले, नागरमोथेका चूर्ण एक तोला, वायविडंगका चूर्ण १ तोला,
चव्यका चूर्ण १ तोला और चीतेकी जड़का चूर्ण १ तोला मिलावे ।
प्रतिदिन प्रातःकाल शीतल जलके साथ भक्षण करनेसे त्रिदोषज
शूल, कटिशूल, हृदयशूल, पार्श्वशूल, अम्लपित्त, बवासीर, प्रमेह
और विसूचिकारोग नष्ट होते हैं । यह शूलराज लोह महादेवने
कहा है ॥ २४-२८ ॥
विद्याधराभ्र रस ।
विडङ्गमुस्तत्रिफलागुडूची दन्ती त्रिवृद्वह्निकटुत्र-
यञ्च । प्रत्येकमेषां पिचुभागचूर्णं पलानि चत्वार्य-
यसो मलस्य ॥ २९ ॥ गोमूत्रशुद्धस्य पुरातनस्य
यद्वायसस्तानिश्शिवाटिकायाः । कृष्णाभ्रचूर्णस्य
पलं विशुद्धं निश्चन्द्रकं शुद्धमतीव सूतात् ॥ ३० ॥
पादोनकर्षं स्वरसेन खल्ले शिलातले थानकुनी-
दलस्य । संमर्द्य पश्चादतिशुद्धगन्धपाषाणचूर्णेन
पिचुन्मितेन ॥३१॥ युक्त्या ततः पूर्वरजांसि दत्त्वा
सर्पिर्मधुभ्यामवमर्द्य यत्नात् । निधापयेत्स्निग्ध-
विशुद्धभाण्डे ततः प्रयोज्योऽस्य रसायनस्य॥३२॥
प्राङ्माषको वाप्यथवा द्वितीयो गव्यं पयो वा
शिशिरं जलं वा । पिबेदयं योगवरः प्रभूतकाल-
प्रनष्टानलदीपकश्च ॥ ३३ ॥
गोरखमुंडीके पत्तोंके रसके द्वारा शुद्ध किया हुआ पारा ९ मासे
और शुद्ध गन्धक १ कर्ष लेवे । दोनोंको एकत्र खरल करके कज्जली