रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३८२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
सेवन करनेसे शूल, रक्तपित्त, अम्लपित्त और आमवात रोग नष्ट
होते हैं । इस आमवातगजसिंह मोदकको ब्रह्माने कहा है ॥२१-२६॥
रामबाणो रसो देयो योगवाहिरसेन्द्रकाः ।
आमवाते विधीयन्ते सानुपानैः प्रयत्नतः ॥ २७॥
इति रसेन्द्रसारसंग्रहे आमवाताधिकारः ।
आमवात रोगमें रामबाण रस अथवा और भी योगवाही रसोंका
उचित अनुपान या आमवातनाशक औषधियोंके क्वाथसे प्रयोग
करना चाहिये ॥ २७ ॥
इति आमवातचिकित्सा ।
अथ शूलरोगचिकित्सा ।
सप्तामृत लोह ।
मधुकं त्रिफलाचूर्णमयोरजः समं लिहन् ।
मधुसर्पिर्युतं सम्यक् गव्यक्षीरं पिबेदनु ॥ १ ॥
छर्दिं सतिमिरं शूलमम्लपित्तं ज्वरारुचिम् ।
मूत्रकृच्छ्रं तथा मेह हन्यादेतन्न संशयः ॥ २ ॥
मुलैठी, त्रिफला और लोहभस्मका चूर्ण इन औषधियोंको
समान भाग लेकर घृत और सहतमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे
गायका दूध पीवे । इसके सेवन करनेसे वमन, तिमिर रोग, शूल,
अम्लपित्त, ज्वर, अरुचि, मूत्रकृच्छ्र और प्रमेह रोग नष्ट होते हैं ।
इसको सप्तामृत लोह कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥
त्रिफला लोह ।
तीक्ष्णायश्चूर्णसंयुक्तं त्रिफलाचूर्णमुत्तमम् ।
क्षीरेण पाययेद्धीमान्सद्यः शूलनिवारणम् ॥ ३ ॥
तीक्ष्ण लोहेका चूर्ण और त्रिफलेका चूर्ण दोनोंको खरल करके
दूधके साथ सेवन करनेसे शूलरोग शांत होता है । इसको त्रिफला
लोह कहते हैं ॥ ३ ॥