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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 406, कुल 584 में से

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पृष्ठ 406

( ३६० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
विधारेके बीज, निसोधकी जड़, दंतीकी जड़, गजपीपल, मानकंद,
हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, चित्रक, नागरमोथा और
वायविडंग यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोहभस्म १४
भाग लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर सेवन करनेसे सर्व प्रकारके रोग
नष्ट होते हैं ॥ १६ ॥
शिवागुग्गुलु ।
शिवाविभीतामलकीफलानां प्रत्येकशो मुष्टि-
चतुष्टयञ्च । तोयाढके तत्कथितं विधाय पादाव-
शेषे त्ववतारणीयम् ॥ १७॥ एरण्डतैलं द्विपलं
निधाय पिचुत्रयं गन्धकनामकस्य। पचेत्पुरस्यात्र
पलद्वयञ्च पाकावशेषे च विचूर्ण्य दद्यात् ॥१८॥
रास्ना विडंगं मरिचं कणा च दन्ती जटा नागर-
देवदारु । प्रत्येकशः कोलमितं तथैषां विचूर्ण्य
निःक्षिप्य नियोजयेच्च ॥ १९ ॥ आमवाते कटी-
शूले गृध्रसीक्रोष्टुशीर्षके । न चान्यदस्ति भेषज्यं
यथाऽयं गुग्गुलुः स्मृतः ॥ २० ॥
हरड़ १६ तोले, बहेड़ा १६ तोले, आमले १६ तोले परिमाण
लेकर ८ सेर जलमें पकावे, जब पकते पकते जल चौथाई भाग बाकी
रह जाय तब उतारकर छान लेवे । फिर इस क्वाथमें दो पल एरंडीका
तेल, गंधक ३ तोले और गूगल २ पल डालकर मंद मंद अग्निसे
पकावे । जब पाक समाप्त हो जाय तब इसमें रास्नाका चूर्ण, वायविडं-
गका चूर्ण, काली मिरचोंका चूर्ण, पीपलका चूर्ण, दंतिमूल, सोंठका
चूर्ण और देवदारुका चूर्ण प्रत्येक एक एक तोला डालकर उतार लेवे ।
आमवात, कटीशूल, गृध्रसी और क्रोष्टुशीर्षक प्रभृति रोगोंका नाशक
इसके समान अन्य औषधि नहीं है ॥ १७-२० ॥