रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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कुष्ठ रोगमें जो औषधि कही हैं वह सब औषधि इस वातरक्त रोगमें
भी प्रयुक्त करनी चाहिये तथा इस रोगमें रोगीके शरीरमेंसे रुधिर
निकलवाना चाहिये ॥ २३ ॥ इति वातरक्ताधिकार संपूर्ण ।
अथ ऊरुस्तम्भरोगचिकित्सा ।
गुञ्जाभद्र रस ।
निष्कत्रयं शुद्धसूतं निष्कद्वादश गन्धकम् ।
गुञ्जाबीजञ्च षड्निष्कं जयन्तीनिम्बबीजकम् ॥ १ ॥
प्रत्येकं निष्कमात्रन्तु निष्कं जैपालबीजकम् ।
जयाजम्बीरधूस्तूरकाकमाचीद्रवैर्दिनम् ॥ २ ॥
भावयित्वा वटीं कुर्याच्चतुर्गुञ्जाप्रमाणतः ।
गुञ्जाभद्ररसो नाम हिंगुसैन्धवसंयुतः ॥
शमयत्युल्बणं दुःखमूरुस्तम्भं सुदारुणम् ॥ ३ ॥
पारा ३ निष्क, गंधक १२ निष्क, सफेद घुंघुचीके बीज ६ निष्क,
जयंतीके बीज, नीमके बीज और जमालगोटे यह प्रत्येक औषधि एक
एक निष्क (चार मासे) लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर
भांग, जम्भीरी नींबू, धतूरेके पत्ते और मकोय इन प्रत्येकके रसमें
एक एक भावना देकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इन
गोलियोंको हींग और सेंधानमकके साथ सेवन करे तो दारुण ऊरुस्तम्भ
रोग दूर होता है । इसको गुञ्जाभद्र रस कहते हैं ॥ १-३ ॥
शिलाजतु गुग्गुलु वा पिप्पलीमथ नागरम् ।
ऊरुस्तम्भे पिबेन्मूत्रैर्दशमूलीरसेन वा ॥ ४ ॥
प्लीहाधिकारे कथितं रसेन्द्रवारिशोषणम् ।
ऊरुस्तम्भे प्रयुञ्जीत चान्यद्वा योगवाहिकम् ॥ ५ ॥
इति रसेन्द्रसारसंग्रहे ऊरुस्तम्भाधिकारः ।