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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 399, कुल 584 में से

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पृष्ठ 399

भाषाटीकासहित । ( ३७३ )
समान भाग लेकर त्रिफलेके रसमें तीन और भांगरेके रसमें तीन
भावना देवे, पश्चात् चनेकी बराबर प्रतिदिन एक एक गोली सेवन
करावे । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें नीमके पत्ते, नीमके फूल
और नीमकी छालका चूर्ण बनाकर घृतके द्वारा सेवन करे । इस
औषधिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके वातरोग, घोरतर गम्भीर
त्रिदोषज, सर्व उपद्रव संयुक्त और साध्यासाध्य वातरक्त नष्ट होता है।
इसको वातरक्तान्तक रस कहते हैं ॥ ४-८ ॥
तालभस्म ।
हरितालं पलं शुद्धं तथा कर्षं विषस्य च ।
श्वेताङ्कोठरसेनैव द्वयमेकत्र खल्लयेत् ॥ ९ ॥
पलाशभस्म द्विपलं निधाय स्थालिकोपरि ।
तद्भस्मोपरि तालस्य गोलकं स्थापयेत्सुधीः॥ १० ॥
तस्योपरि अपामार्गभस्म दद्यात्पलत्रयम् ।
स्थालीमुखे शरावञ्च दद्याद्यत्नेन लेपयेत् ॥ ११ ॥
लेपयित्वा ततश्चुल्यामहोरात्रं पचेद्भिषक् ।
ततस्तु जायते भस्म शुद्धकर्पूरसन्निभम् ॥ १२ ॥
गुञ्जात्रयं ततो भक्ष्यमनुपानविशेषतः ।
वातरक्तञ्च कुष्ठञ्च दद्रुविस्फोटकापचीम् ॥ १३ ॥
विचर्चिकां चर्मदलं वातरक्तञ्च शोणितम् ।
रक्तपित्तं तथा शोथं गलत्कुष्ठं विनाशयेत् ॥
हलीमकं तथा शूलमग्निमान्द्यमरोचकम् ॥ १४ ॥
शुद्ध हरिताल १ पल और विष १ कर्ष परिमाण लेवे । दोनोंको
एकत्र सफेद अंकोलकी जड़के रसमें खरल करके पिंडसा बना
लेवे । फिर एक हांडीमें दो पल परिमाण ढाकका खार बिछाकर