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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 398

( ३७२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
आजानुस्फुटितं घोरं सर्वाङ्ग-स्फुटितं तथा ।
तत्सर्वं नाशयेत्याशु साध्यासाध्यञ्च शोणितम् ॥३॥
कलिहारीकी जड़, त्रिकुटा, त्रिफला, दाख और गूगल यह प्रत्येक
औषधि एक एक भाग लेवे, लोहाभस्म ९ नव भाग लेवे, इन सब
औषधियोंको एकत्र पीसकर बिजोरे नींबूके रसमें और त्रिफलेके रसमें
खरल करके एक एक तोलेकी गोली बना लेवे । सहतके साथ इस
औषधिके सेवन करनेसे जानुपर्यंत स्फुटित वातरक्त, सर्वांग स्फुटित
वातरक्त और साध्यासाध्य वातरक्त नष्ट होता है । इसको लाङ्ग-
ल्याद्य लोह कहते हैं ॥ १-३ ॥
वातरक्तान्तक रस ।
गन्धकं पारदं लौहं शिलां तालं घनं तथा ।
शिलाजतु पुरं शुद्धं समभागं विचूर्णयेत् ॥ ४ ॥
श्वेतापराजिता दार्वी वागुची चित्रकं तथा ।
पुनर्नवा देवकाष्ठत्रिफलाव्योषवेल्लकम् ॥ ५ ॥
चूर्णमेषां पृथक् तुल्यं सर्वमेकत्र कारयेत् ।
त्रिफलाभृंगराजस्य रसेनैव त्रिधा त्रिधा ॥ ६ ॥
भावयेद्भक्षयेत्पश्चाच्चणमात्रं दिने दिने ।
ततोनुपात्रं निम्बस्य पत्रं पुष्पं त्वचं समम् ॥ ७ ॥
शाणमानं घृतैः कुर्यात्सर्ववातविकारनुत् ।
वातरक्तं महाघोरं गम्भीरं सर्वजं च यत् ॥
सर्वोपद्रवसंयुक्तं साध्यासाध्यं निहन्त्यलम् ॥ ८ ॥
गंधक, पारा, लोहभस्म, मैनशिल, हरिताल, नागरमोथा, शिला-
जीत, गूगल, सफेद कोइलकी जड़, दारुहलदी, बावची, चीतेकी जड़,
पुनर्नवा, देवदारु, त्रिफला, त्रिकुटा और वायविडंग इन सब औषधियोंको