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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 388

( ३६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
मणिरेष नाम्ना संपूज्य सम्यग्गिरिजां दिनेशम् ॥
॥ ८९ ॥ हन्त्यामयान्योगशतैर्विवर्ज्यामयप्रणाशाय
मुनिप्रणीतः । अस्य प्रसादेन गदानशेषाञ्जरां
विनिर्जित्य सुखं विभाति ॥ ९० ॥
हीराभस्म, सोनाभस्म और चाँदीभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक
भाग लेवे, तीक्ष्ण लोहभस्म ३ भाग, अभ्रकभस्म ६ भाग, और रस-
सिन्दूर ६ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके लोह अथवा
पत्थरके खरलमें घीक्वारके रसके द्वारा खरल करके एक एक
रत्तीकी गोली बना लेवे । पार्वती और सूर्यदेवकी पूजा करके इस
औषधिका सेवन करना आरम्भ करे । जो रोग सैकड़ों औषधियोंके
सेवन करनेसे भी शांत नहीं होते उन समस्त रोगोंको शमन
करनेके लिये यह औषधि मुनिजनोंने कही है । इस औषधिके
प्रभावसे मनुष्योंके समस्त रोग और वृद्धता नष्ट होकर सुखकी
वृद्धि होती है ॥ ८८–९० ॥
स्निग्धे श्लेष्मण्यार्द्रकस्य रसेन पाययेत्सुधीः ।
शुष्के च माक्षिकेणैव पित्ते घृतसितायुतम् ॥९१॥
श्लेष्मणि मारुते सम्यग्दुष्टे च समतां गते ।
कणाचूर्णं क्षौद्रयुतं प्रमेहे दुग्धसंयुतम् ॥ ९२ ॥
बलवर्णाग्निजननः कासघ्नः कफवातजित् ।
आयुःपुष्टिकरो वृष्यः सर्वरोगनिषूदनः ॥ ९३ ॥
इति वातव्याध्यधिकारः ।
जो कफकी स्निग्धता हो तो अदरखके रसके साथ, कफ शुष्क
( खुश्क ) होय तो सहतके साथ, पित्तयुक्त वातरोगमें घृत और
मिश्रीके साथ, कफाश्रित वायुमें और जो वायु अच्छे प्रकारसे दूषित
होकर चिकित्सासे शमन नहीं होती ऐसी वायुमें पीपलके चूर्ण और