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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 584 में से

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पृष्ठ 385

भाषाटीकासहित । ( ३५९ )
सर्वाङ्गसुन्दर रस ।
शुद्धसूताभ्रताम्रायोहिङ्गुलं कार्षिकं समम् ।
गन्धकश्चैकभागः स्यात्सर्वमेकत्र मर्दयेत् ॥ ७३ ॥
सप्तपर्णार्कस्नुक्क्षीरवासावातारिवारिणा ।
विषमुष्टिसमं सर्वं पेष्यं तद्गोलकीकृतम् ॥ ७४ ॥
विपचेद्वालुकायन्त्रे द्वियामान्ते समुद्धरेत् ।
पिप्पलीविषसंयुक्तो रसः सर्वाङ्गसुन्दरः ॥
सर्ववातविकारघ्नः सर्वशूलनिषूदनः ॥ ७५ ॥
पारा, अभ्रकभस्म, तांबाभस्म, लोहभस्म, सिंग्रफ और गंधक
यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेवे । इन सबको एकत्र
पीसकर सतोनेके दूध, आकके दूध, थूहरके दूध, अडूसेके रस और
एरंडकी जड़के रसके द्वारा खरल करके उसमें समभाग कुचला मिलावे ।
फिर खरल करते करते जब खूब गाढ़ा होजाय तब गोलासा बना
लेवे । फिर इसको दो प्रहरतक बालुकायंत्रमें पकावे । शीतल होनेपर
फिर उसमें पीपलका चूर्ण १ कर्ष और विष १ कर्ष मिलावे । इस
औषधिको यथोचित मात्रानुसार यथायोग्य अनुपानके साथ सेवन
करनेसे सब प्रकारके वातरोग और सर्व प्रकारके शूल नष्ट होते हैं ।
इसको सर्वांगसुन्दर रस कहते हैं ॥ ७३-७५ ॥
तालकेश्वर रस ।
एकभागो रसस्य स्याच्छुद्धस्तालैकभागिकः ।
अष्टौ स्युर्विजयायाश्च गुटिकां गुडतश्चरेत् ॥ ७६ ॥
ऐकैकां भक्षयेत्प्रातश्छायायामुपवेशयेत् ।
तालकेश्वरनामायं रोगश्चास्पर्शनाशनः ॥ ७७ ॥
रससिन्दूर १ भाग, हरिताल १ भाग, भांगका चूर्ण ८ भाग लेवे
और सब औषधियोंसे दुगुना पुराना गुड़ लेवे । इसकी गोली बना-