रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३४७ )
रससिन्दूर, सोनाभस्म, हीराभस्म, तांबाभस्म, लोहाभस्म, सोना-
माखीभस्म, हरितालभस्म, रसौत, तूतिया, समुद्रफेन और पांचोंलवण
यह सब औषधि समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके मूषामें
रखकर भूधरयन्त्रमें पकावे । इसमेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि लेकर
अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे वातरोग नष्ट होता है । इसके
सेवन करनेके अन्तमें पीपलके क्वाथमें पीपलका चूर्ण डालकर पान
करे । इससे आक्षेपकादि समस्त वातरोग नष्ट होते हैं ॥ १४-१६ ॥
वातारि रस ।
रसभागो भवेदेको द्विगुणो गन्धको मतः ।
त्रिगुणा त्रिफला ग्राह्या चतुर्भागं तु चित्रकम्॥१७॥
गुग्गुलोः पञ्चभागं चैरण्डतैलेन मर्दयेत् ।
क्षिप्त्वात्र पूर्वकं चूर्णं पुनस्तेनैव मर्दयेत् ॥ १८ ॥
गुटिकां कर्षमात्रान्तु भक्षयेत्प्रातरुत्थितः ।
नागरैरण्डमूलानां क्वाथं तदनुपाययेत् ॥ १९ ॥
अङ्ग-मेरण्डतैलेन स्वेदयेत्पृष्ठदेशतः ।
विरेके तेन सञ्जाते स्निग्धमुष्णञ्च भोजयेत् ॥
वातारिसंज्ञको ह्येष रसो निर्वातसेवितः ॥ २० ॥
पारा १ भाग, गन्धक २ भाग, त्रिफला ३ भाग, चित्रककी जड़
४ भाग, गूगल ५ भाग लेवे । प्रथम गूगलको एरण्डीके तेलमें खरल
करके पूर्वोक्त पारा आदि औषधियोंको मिलाकर फिर एरण्डीके तेलमें
सबको एकत्र घोटे । इसमेंसे प्रतिदिन एक कर्ष परिमाण गोली बना-
कर भक्षण करे । ऊपरसे सोंठ और एरण्डीकी जड़का क्वाथ पीवे । पृष्ठसे
लेकर सम्पूर्ण शरीरमें एरण्डीके तेलका मर्दन करे । जो एरण्डीतेलके
मर्दन करनेसे दस्त होने लगे तो स्निग्ध और उष्ण पदार्थ भक्षण
करे । वातरहित स्थानमें रहकर इस औषधिका सेवन करे । इसको
वातारि रस कहते हैं ॥ १७-२० ॥