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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 584 में से

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पृष्ठ 363

भाषाटीकासहित । ( ३३७ )
बराबर गोली बनाकर छायामें सुखा लेवे । इस औषधिको प्रातः-
काल, संध्याके समय और रात्रिके समय नेत्रोंमें लगावे । दिनमें सह-
तके साथ और रात्रिमें जलके द्वारा अंजन लगावे । इससे चातुर्थिक
ज्वर, अपस्मार और उन्माद ज्वर नष्ट होते हैं । इसको उन्मादभञ्जिनी
वटिका कहते हैं ॥ १०-१३ ॥
त्रिकत्रयाद्य लोह ।
त्रिकत्रयसमायुक्तं जीवनीययुतं त्वयः ।
हन्त्यपस्मारमुन्मादं वातव्याधिं सुदुस्तरम् ॥ १४ ॥
हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, चित्रककी जड़,
नागरमोथा, वायविडंग, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली,
क्षीरकाकोली, मुद्रपर्णी, माषपर्णी, जीवन्ती और मुलैठी यह प्रत्येक
औषधि एक एक भाग लेवे और लोहा भस्म १८ भाग लेवे । इन
सब औषधियोंको एकत्र खरल करके सेवन करनेसे उन्माद रोग,
अपस्मार और वातव्याधि रोग नष्ट होते हैं । इसको त्रिकत्रयाद्य
लोह कहते हैं ॥ १४ ॥
उन्मादभञ्जन रस ।
त्रिकटु त्रिफला चैव गजपिप्पलिका तथा ।
देवदारु विडङ्गं च किरातं कटुकी तथा ॥ १५ ॥
कण्टकारी च यष्टीन्द्रयवं चित्रकमेव च ।
बला च पिप्पलीमूलं मूलं च वीरणस्य च ॥ १६ ॥
शोभाञ्जनस्य बीजानि त्रिवृता चेन्द्रवारुणी ।
वङ्गं रूप्यकमभ्रं च प्रवालं समभागिकम् ॥ १७ ॥
सर्वचूर्णसमं लौहं सलिलेन विमर्दयेत् ।
उन्मादमपि भूतोत्थमुन्मादं वातजं तथा ॥ १८ ॥