रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३३९ )
अथारोचकचिकित्सा ।
सुधानिधि रस ।
रसगन्धौ समौ शुद्धौ दन्तीक्वाथेन भावयेत् ।
जम्बीरस्य रसेनैव आर्द्रकस्य रसेन च ॥ १ ॥
मातुलुङ्गस्य तोयेन तस्य मज्जारसेन च ।
पश्चाद्विशोष्य सर्वांस्तान् टंकणञ्चोपचारयेत् ॥ २ ॥
देवपुष्पं बाणमितं रसपादं मृतामृतम् ।
माषमात्रञ्च तत्सर्वं नागरेण गुडेन वा ॥ ३ ॥
सर्वारोचकशूलार्तिसामवातं सुदारुणम् ।
विषूचीञ्चाग्निमान्द्यं च भक्तद्वेषञ्च दारुणम् ॥
रसोऽयं वारयत्याशु केसरी करिणं यथा ॥ ४ ॥
शुद्ध पारा १ भाग, गंधक १ भाग इन दोनोंकी एकत्र कज्जली
बनाकर जम्भीरी नींबूका रस, अदरखका रस, बिजौरे नींबूका रस
और बिजौरे नींबूकी मज्जाके रसमें अलग अलग सात सात भावना
देकर पश्चात् इसमें सुहागा ५ भाग, लौंग ५ भाग और पारेसे चौथाई
भाग शुद्ध विष मिला लेवे । इसमेंसे एक मासा औषधि लेकर सोंठके
चूर्णके साथ अथवा गुड़के साथ सेवन करनेसे सब प्रकारकी अरुचि,
शूल, आमवात, विषूचिका, मंदाग्नि प्रभृति रोग नष्ट होते हैं । इसको
सुधानिधि रस कहते हैं ॥ १-४ ॥
सुलोचनाभ्र ।
पलं सुजीर्णं गगनं तु वज्रकं तेजोवती कोलमुशीर-
दाडिमम् । धात्र्यम्लरोलीरुचकं पृथग्दशपलो-
न्मतं मर्दितमेव सेवितम् ॥ ५ ॥ अरोचकं