रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३२३ )
सूतायां ग्रहणीदोषे शूले पाण्ड्वामये तथा ।
हस्तपादादिदाहेषु वटिकेयं प्रशस्यते ॥ ६ ॥
पारा, गंधक, लोहभस्म, विष, अभ्रकभस्म, वायविडंग, रेणुका,
नागरमोथा, इलायची, पीपलामूल, नागकेशर, त्रिकुटा, त्रिफला,
तांबाभस्म, शुद्ध जमालगोटे और चीतेकी जड़ यह प्रत्येक औषधि एक
एक भाग लेवे और सबसे दोगुना पुराना गुड़ लेवे । इन सबको एकत्र
खरल करके सेवन करनेसे खांसी, श्वास, क्षय, गुल्म, प्रमेह, विषम-
ज्वर, सूतिका, संग्रहणी, शूल, पांडु और हाथ पांव आदिकी दाह दूर
होती है । इसको विजयवटी कहते हैं ॥ ४-६ ॥
घृतेन पाचयेन्मूलं पत्रञ्च वासकस्य तु ।
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय कासे श्वासे क्षये तथा ॥ ७ ॥
अडूसेकी जड़ और अडूसेके पत्तोंको घृतमें भूनकर प्रातःकाल सेवन
करनेसे खाँसी, श्वास और क्षयरोग नष्ट होते हैं ॥ ७ ॥
शुण्ठीचूर्णं समं देयं पिप्पली देवदारु च ।
ऊर्ध्वश्वासं सदा हन्ति पिबेदुष्णजलेन च ॥ ८ ॥
पीपल, देवदारु और सोंठके चूर्णको गरम जलके साथ सेवन
करनेसे उर्ध्वश्वास नष्ट होता है ॥ ८ ॥
लोहपर्पटी रस ।
भागौ रसस्य गन्धस्य द्वावेको लौहभस्मतः ।
एतद् घृष्टं द्रवीभूतं मृद्वग्नौ कदलीदले ॥ ९ ॥
पातयेद्गोमयगते तथैवोपरि योजयेत् ।
ततः पिष्ट्वा द्रवैरेभिः सप्तधा भावयेत्पृथक् ॥ १० ॥
भार्ङ्गी मुण्डी मुनिवरा जया निर्गुण्डिका तथा ।
व्योषवासककन्यार्द्रद्रवैरेताः पुटे पचेत् ॥ ११ ॥