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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 342

( ३१६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
दारुण सन्निपातरोग नष्ट होता है । इससे अनेक प्रकारकी खांसी और
शिरोरोग नष्ट होते हैं । इसको कासकुठार रस कहते हैं ॥ ७४ ॥
चन्द्रामृत लोह ।
त्रिकटु त्रिफला धान्यं चव्यं जीरकसैन्धवम् ।
दिव्यौषधिहतस्यापि तत्तुल्यमयसो रजः ॥७५॥
नवगुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् ।
प्रातःकाले शुचिर्भूत्वा चिन्तयित्वाऽमृतेश्वरीम्॥७६॥
एकैकां वटिकां खादेद्रक्तोत्पलरसाप्लुताम् ।
नीलोत्पलरसेनैव कुलत्थस्वरसेन च ॥ ७७ ॥
निहन्ति विविधं कासं दोषत्रयसमुद्भवम् ।
वातिकं पैत्तिकञ्चैव गरदोषसमुद्भवम् ॥ ७८ ॥
सरक्तमथ नीरक्तं ज्वरं श्वाससमन्वितम् ।
भ्रमतृड्दाहशूलघ्नं रुच्यं वह्निप्रदीपनम् ॥ ७९ ॥
बलवर्णकरं वृष्यं जीर्णज्वरविनाशनम् ।
इदं चन्द्रामृतं लौहं चन्द्रनाथेन निर्मितम् ॥ ८० ॥
त्रिकुटा, त्रिफला, धनिया, चव्य, जीरा और सेंधानमक यह प्रत्येक
औषधि एक एक भाग, मैनशिलके द्वारा मारा हुआ लोहा दश भाग
लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र जलमें खरल करके नौ नौ रत्तीक
गोलियां बना लेवे । प्रातःकाल पवित्र होकर अमृतेश्वरीका ध्यान करके
एक एक गोली लाल कमोदिनीके रसके द्वारा अथवा नीलोत्पलके
रसके द्वारा, अथवा कुलथीके द्वारा सेवन करे । इस औषधिके सेवन
करनेसे अनेक प्रकारकी खाँसी, त्रिदोषज कास, वातज कास, पित्तज
कास, विषदोषोद्भव कास, रुधिरयुक्त कास, रक्तरहित कास, श्वास-
युक्त ज्वर, भ्रम, तृषा, दाह और शूलरोग शमन होते हैं ।