रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३११ )
इस औषधिके सेवन करनेपर पान और भोजनका कुछ नियम
नहीं है । शीत पवन और सूर्यकी धूपका सेवन, स्त्रीप्रसंग आदिका
कुछ परहेज नहीं है । इसपर यथेष्ट आहार और विहार करे । इस
औषधिके सेवन करनेसे मनुष्य सुवर्णके समान वर्णवाला हो जाता
है । इसको महोदधि रस कहते हैं ॥ ४५-५० ॥
जया गुटिका ।
सूतकं गन्धकं लौहं विषं वत्सकमेव च ।
विडङ्गं केशरं मुस्तमेलाग्रन्थिकरेणुकम् ॥ ५१ ॥
त्रिकटु त्रिफला चित्रं शुद्धं जैपालबीजकम् ।
एतानि समभागानि द्विगुणो गुड उच्यते ॥ ५२ ॥
तिन्तिडीबीजमानेन प्रातःकाले च भक्षयेत् ।
कासं श्वासं क्षयं गुल्मं प्रमेहं विषमज्वरम् ॥ ५३ ॥
अजीर्णं ग्रहणीरोगं शूलं पाण्ड्वामयन्तथा ।
अपाने हृदये शूले वातरोगे गलग्रहे ॥ ५४ ॥
अरुचावतिसारे च सूतिकातङ्कपीड़िते ।
जयाख्या निर्मिता ह्येषा भक्षणीया सुरैरपि ॥ ५५ ॥
पारा, गंधक, लोहभस्म, विष, कुड़ेकी छाल, वायविडंग, नाग-
केशर, नागरमोथा, इलायची, पीपलामूल, रेणुका, त्रिफला, त्रिकुटा,
चीतेकी जड़ और शुद्ध जमालगोटे यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग
लेवे और सब चूर्णसे दुगुना पुराना गुड़ लेवे । इन सब औषधियोंको
एकत्र पीसकर इमलीके बीजोंकी समान गोली बनाकर प्रातःकाल नित्य
सेवन करनेसे कास, श्वास, क्षय, गुल्म, प्रमेह, विषमज्वर, अजीर्ण,
संग्रहणी, शूल और पांडुरोग नष्ट होते हैं । इस औषधिका गुह्यशूल,
हृदयशूल, वातरोग, गलेकी पीड़ा, अरुचि, अतिसार और सूतिकारोगमें